“धर्म की वेदी पर अपने प्राण अर्पित करने वाले मौन वीर”
🏡 परिचय एवं जन्मभूमि
श्री नन्हूसिंह जी बुंदेलखंड के निवासी थे। आपके पिता का नाम श्री गणेशसिंह जी था। बचपन से ही आपकी प्रवृत्ति धार्मिक रही। जीवन में कठिनाइयों के बावजूद आप सच्चाई और धर्म के मार्ग पर अडिग रहे।
💪 साधारण जीवन, असाधारण बलिदान
अमरावती में रहकर मजदूरी करते हुए आप अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। परंतु जब धर्म और न्याय की पुकार सुनाई दी, तो आपने सब कुछ त्याग कर सत्याग्रह के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने का निश्चय किया।
🚩 हैदराबाद सत्याग्रह में सहभागिता
हैदराबाद के निजामशाही अत्याचारों के विरुद्ध जब अखिल भारतीय आर्य समाज ने सत्याग्रह का बिगुल बजाया, तो 52 वर्ष की आयु में आपने अमरावती से वकील नाता साहब भट्ट के साथ हैदराबाद कूच किया। वहां आपको गिरफ्तार कर बडवलगुड़ा जेल में डाल दिया गया।
⚔ कारागार में अमानवीयता एवं बलिदान
26 मई 1939 को जेल में बीमार पड़ने के बाद भी उचित उपचार नहीं मिला। जेलकर्मियों द्वारा क्रूरतापूर्वक मारपीट के कारण आप गंभीर रूप से घायल हो गए। 29 मई 1939 को उस्मानिया अस्पताल में निमोनिया और अत्याचारों से आपकी मृत्यु हो गई।
🕯 गुप्त दाहसंस्कार एवं अत्याचार का वीभत्स चेहरा
सरकार ने आपकी मृत्यु तक की सूचना नहीं दी। सार्वदेशिक सभा ने लगातार तार भेजे, पर कोई उत्तर नहीं मिला। सत्याग्रह समिति के हरिश्चंद्र विद्यार्थी जी ने अथक प्रयास कर उस स्थान का पता लगाया जहाँ आपका अधजला शव पड़ा था।
शव को टाट और गंदे कपड़े में लपेट कर एक अंधेरे कोने में फेंक दिया गया था। अंत्येष्टि भी गुपचुप कर दी गई। आधा जला शरीर और अलग पड़ी खोपड़ी देखकर अधिकारियों की बर्बरता का वीभत्स रूप सामने आया।
🌹 सच्चा श्रद्धांजलि संदेश
श्री नन्हूसिंह जी जैसे मौन वीरों के त्याग और बलिदान की स्मृति हमें सदा प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर धर्म की मशाल को बुझने नहीं दिया। उनका यह महान बलिदान आर्य समाज और भारतवर्ष के इतिहास में सदा अमर रहेगा।










