“यश्च धर्मरतः स गति लभते।”
(जो धर्म में रत रहता है, वही सच्ची गति प्राप्त करता है।)
जन्म, परिवार एवं प्रारम्भिक जीवन
लाला नन्दलाल जी का जन्म 3 नवम्बर 1908 को लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ। आपके पिता का नाम लाला निहालचन्द जी एवं माता का नाम भगवानेदेवी जी था। दो भाई और एक बहन में आप विशेष रूप से धार्मिक प्रवृत्ति के थे। बचपन में निर्धनता के कारण नवमी कक्षा तक पढ़ने के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
आर्यसमाज से जुड़ाव एवं धार्मिक शिक्षा
लाला नन्दलाल जी को आर्यसमाज की प्रेरणा लाला गणेशीलाल जी से मिली। उन्होंने इनसे न केवल आर्य समाज के संस्कार सीखे बल्कि बजाजी (कपड़े बेचने) का कार्य भी सीखा। गाँव-गाँव फेरी कर कपड़ा बेचते समय आप धर्म-प्रचार भी किया करते थे।लाला गणेशीलाल जी कुरान का भी अच्छा ज्ञान रखते थे। उनके सान्निध्य में नन्दलाल जी ने भी कुरान का अध्ययन किया और उसके विशेष अंश कंठस्थ कर लिए। धर्म चर्चाओं में वे बहुत निपुण हो गए थे।
धर्म प्रचार एवं संघर्ष
लाला नन्दलाल जी की सच्ची निडरता और तार्किकता मुसलमान कट्टरपंथियों को रास नहीं आई। एक बार हलाल और मुर्दार पर, और एक बार खुदा के शरीरी-अशरीरी होने पर उनकी मुसलमानों से गंभीर बहस हुई। कुरान और मिश्कात के प्रमाण देकर उन्होंने अपने पक्ष को मजबूत किया, जिससे उनके विरोधी बौखला उठे।इसके बाद कट्टरपंथियों ने षड्यंत्रपूर्वक नन्दलाल जी की हत्या की योजना बनाई।
सासियों की शुद्धि एवं आर्य समाज सेवा
आपने आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के आदेशानुसार सासियों की शुद्धि का कार्य किया। कई मुसलमानों को शुद्ध कर आर्य धर्म में वापस लाया। वाजीगरों को मुसलमान बनाने के प्रयासों के विरुद्ध भी आपने साहसिक कार्य किया।
कर्तव्य मार्ग पर वीरगति
12 नवम्बर 1927 को जब आप फेरी का कार्य कर लौट रहे थे, षड्यंत्र के तहत देर करवाई गई। रास्ते में सग्गीयां नामक स्थान पर आपकी हत्या कर दी गई। 15 नवम्बर को आपका शव रावी नदी में मिला, शरीर पर चोट के निशान और गला घोंटने के प्रमाण मिले।16 नवम्बर 1927 को आर्य समाज बच्छोवाली द्वारा आपका अन्तिम संस्कार श्रद्धा और सम्मान के साथ किया गया।
चरित्र एवं स्मरण
लाला नन्दलाल जी युवकों के संगठन में रुचि रखने वाले, सत्यप्रिय, आचारवान, और धर्म के प्रति समर्पित थे। लाला गणेशीलाल जी को वे आदर से पिता कहा करते थे। उनका जीवन सच्चे आर्य समाजी की मिसाल है, जिन्होंने धर्म के लिए प्राणों की आहुति दी।
श्रद्धांजलि
लाला नन्दलाल जी का बलिदान हमें यह सिखाता है कि धर्म और सच्चाई की राह पर अडिग रहना ही सच्ची आर्य परंपरा है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।










