अमर बलिदानी श्री शान्तिप्रकाश जी

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जन्म, परिवार एवं प्रारम्भिक जीवन

श्री शान्तिप्रकाश जी का जन्म संवत् 1978 (ई.स. 1921) में पौष मास की लोहड़ी के दिन, प्रातः 10 बजे, ग्राम कलानौर अकबरी, जिला गुरदासपुर (पंजाब) में हुआ। माता का नाम श्रीमती हीरादेवी एवं पिता का नाम पंडित रामरत्न जी था। आपके तीन भाई — रामस्वरूप, कृष्णकुमार, रोशनलाल और एक बहन शकुंतला देवी थीं।बचपन से ही आप में धर्म के प्रति गहरी रुचि रही, जिसका श्रेय आपके पिता की धार्मिक प्रवृत्ति को जाता है। वे धार्मिक सभाओं में आपको साथ ले जाते थे, जिससे धर्म और समाज सेवा की नींव आपके बालमन में पड़ गई।


शिक्षा एवं संगीत प्रेम

प्रारम्भिक शिक्षा कलानौर की पाठशाला में प्राप्त करने के पश्चात आप लाहौर चले गये, जहाँ आपके पिता रेलवे क्लर्क थे। वहाँ प्राइमरी तक पढ़ाई की। बाद में पिता की नौकरी के कारण दिल्ली आ गये और दयानन्द हाई स्कूल में मिडिल कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की।आपको गाना बेहद पसंद था। धार्मिक कार्यक्रमों, सत्संगों, और जेल में भी आप गीतों के माध्यम से लोगों का मनोबल बढ़ाते थे।


हैदराबाद सत्याग्रह में भागीदारी

मिडिल पास करने के बाद आप बम्बई चले गये और वहाँ सुमेर कम्पनी में बिजली का काम सीखने लगे। परन्तु जैसे ही आपको निजाम राज्य में हिन्दुओं पर अत्याचार की खबर मिली, आप सब कुछ छोड़कर आर्यसमाज बम्बई के जत्थे में सम्मिलित होकर शोलापुर पहुँचे। गंजोटी में सत्याग्रह किया और गिरफ्तार होकर उस्मानाबाद जेल भेजे गये।


जेल में अमानवीय अत्याचार एवं अदम्य साहस

जेल में आपसे क्षमा माँगने का दबाव डाला गया, पर आपने गर्व से ठुकरा दिया। क्रूर जेलकर्मियों ने आपको जून की भयंकर गर्मी में दोपहर 12 से 4 बजे तक पत्थर कुटवाया। इससे आप बीमार पड़ गये। बेहोशी की हालत में अस्पताल भेजा गया, पर होश आने पर भी आप माफी मांगने को तैयार नहीं हुए। आपने स्पष्ट कहा — “अब यह शरीर मेरा नहीं, जाति का है।”बीमार अवस्था में पुनः जेल भेज दिया गया। वहाँ कठोर श्रम करवाया गया जिससे टाइफाइड और निमोनिया हो गया।


🕯शान्तिपूर्वक बलिदान

पुनः अस्पताल में भर्ती किया गया। अधिकारियों ने घर लौटने का प्रस्ताव रखा, पर आप डटे रहे। अपने पिता पं. रामरत्न जी को बुलाया। आपने स्पष्ट कह दिया — “मैं माफी नहीं माँगूंगा, इस पर कोई बात न हो।“27 जुलाई 1939 को अंतिम सांसों में आपने पिता से कहा:
“पता नहीं, आपने किस सोच से मेरा नाम शान्ति रखा था, पर प्रसन्नता की बात है कि मैं ‘शान्ति’ से शरीर छोड़ रहा हूँ। आप भी शान्त रहना।”इसके पश्चात शरीर त्याग दिया। शव के साथ कुछ सत्याग्रही भेजे गये। दाह संस्कार चुपचाप करवा दिया गया। जनता में रोष था, पर शव यात्रा में भाग लेने की अनुमति नहीं मिली।


पिता की गर्व भरी श्रद्धांजलि

जब पं. रामरत्न जी से लोगों ने शोक प्रकट किया, उन्होंने दृढ़ता से उत्तर दिया:
“यह मृत्यु शोक की नहीं, धर्म पर बलिदान की है। मुझे अपने पुत्र की मृत्यु पर गर्व है।”


श्रद्धांजलि संदेश

श्री शान्तिप्रकाश जी ने कम आयु में जो साहस, दृढ़ता और त्याग दिखाया, वह प्रत्येक युवा के लिए प्रेरणा है। उनका बलिदान आर्य समाज, वैदिक धर्म और भारतवर्ष के इतिहास में अमर रहेगा।