अकेला जाना होता है

य॒मस्य॑ लोकादध्या व॑भूविय॒ प्रम॑दा मया॒न्द्र युनक्षि धीर॑ः

एकाकिनना॑ स॒रथं यासि वि॒िद्वान्स्वप्नं मिमा॑नो असुरस्य॒ योनौं ।॥ अथ. १६. ५६.१

तर्जः मेघालय पातिम गुई मोता

परलोक में तो केवल धर्म ही जाता है
पुत्र कलत्र ना जाया पिता माता है
सामान रह जाएगा सब धरा, प्राणी आए अकेला
और कर्म अनुरूप, निज फल पाता है।
परलोक में॥

आया कहाँ से और पाई ये काया
ईश्वर के लोक से है तू आया
पहले तू मुक्त था फिर जन्म-मरण में ढला
ईश्वर के न्याय में तू था बँधा
कर्मबन्धन इसका कारण बना
अब इस प्रवाह में बहा और यूँ ही बहता रहा,
कर्मों के कारण जग में तू आता है
कभी हँसता है कभी पछताता है।
॥ परलोक में॥

हो जाए मानव तू धीर यदि
कर देगा अन्यों को भी तू सुखी
आनन्द में खुद भी रहे, अन्यों को आनन्द दे
चञ्चल अधीरों में साहस नहीं
वो तो सभी को करते हैं दुःखी ना खुद वो शांत रहें,
सबको अशान्त करें क्यों ना
सदा हम सुधीर बनें शांति, धृतात्मा ही पाता है।
॥ परलोक में॥

जीवन मनुष्य का इक स्वप्न है
निज कल्पनाओं में वो मस्त हैं
कल्पनाएँ हैं असत्य स्वप्न के समान अतथ्य
कल्पना छोड़ के जाता है यहाँ
साथ होंगी वासनाएँ वहाँ कर्मदुरित पापी जाएगा बिन साथी
पापी अकेला ही दुष्कर्म भोगे सत्कर्म भोग, उसके काम आता है
॥ परलोक में…॥

(कलत्र) पत्नि। (घृतात्मा) वैर्यवान आत्मा। (अतथ्य) झूठा।

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