अजब हैरान हूँ भगवन्, तुम्हें कैसे रिझाऊँ मैं।

0
91

भक्ति

अजब हैरान हूँ भगवन् !
तुम्हें कैसे रिझाऊँ मैं।
कोई वस्तु नहीं ऐसी,
जिसे सेवा में लाऊँ मैं।।1।।
अजब हैरान हूँ भगवन्……..

करूँ किस तरह आवाहन,
कि तुम मौजूद हो हर जा।
निरादर है बुलाने को,
अगर घंटी बजाऊँ मैं।।2।1
अजब हैरान हूँ भगवन् …

तुम्हीं हो मूर्ति में भी,
तुम्हीं व्यापक ही फूलों में।
भला भगवान् पर भगवान् को
कैसे चढ़ाऊँ मैं। ।।3।।
अजब हैरान हूँ भगवन्…….

लगाना भोग कुछ तुमको,
यह इक अपमान करना है।
खिलाता है जो सब जग को,
कैसे उसे खिलाऊँ मैं।।4।।
अजब हैरान हूँ भगवन् …….

तुम्हारी ज्योति रोशन है
सूरज चाँद और तारे।
महा अंधेरा है, तुमको
अगर दीपक दिखाऊँ मैं। ।।5।।
अजब हैरान हूँ भगवन् ……

भुजायें हैं न सीना है,
न गर्दन है न पेशानी।
कि हो निर्लेप ‘नारायण’,
कहाँ चन्दन लगाऊँ मैं।।6।।
अजब हैरान हूँ भगवन्……