ऐ मेरे वतन के लोगो जयकार ऋषि की लगाओ
ये शुभदिन है हम सवका, हुआ वेदों का उजियारा
मत भूलो धर्म की खातिर दयानन्द ने प्राण गँवाए
तुम याद श्रद्धा से कर लो, तुम याद श्रद्धा से कर लो
जो धर्मवीर कहलाए, जो धर्मवीर कहलाए
ऐ मेरे वतन के लोगों दयानन्द की सुनो कहानी
विष पिए धर्म की खातिर जरा याद करो कुरवानी ॥
थे खेल के दिन बचपन के अंकुर थे ज्ञान के फूटे
शिव के दर्शन के वादे इक इक कर निकले झूठे
पत्थर के शिव की पूजा लगती रही वेमानी ॥ विप पिए…
जब हुई वहन की मृत्यु तब कुछ ना समझ में आया
अमरत्व का प्रश्न उठा फिर तव मूलशंकर भरमाया
चाचा की मृत्यु पर रोया शिशु आँख में भर भर पानी ॥ विष पिए…
वैरागी शिशु ने शिव की राहों में आँख विछा दी
सच्चे शिव दर्शन देंगे ये मन में आस लगा ली
समझाया सबने मिलकर पर बात किसी की न मानी ॥ विष पिए…
घर त्याग के निकला बालक सत्य ज्ञान की शिक्षा पाने
लालायित हुआ वो बालक गुरुओं की दीक्षापाने
और ज्ञान लिया वर्षों तक ना दूर परेशानी ॥ विष पिए…
आखिर गुरु विरजानन्द संग दयानन्द हुए अति ज्ञानी
गुरु की हर आज्ञा ऋषि ने मन वचन कर्म से मानी
ऋपि गुरुभक्त ऐसे थे ना उनका कोई सानी ॥ विष पिए…
गुरु वचन बना गुरु दक्षिणा, जग का अन्धकार बताया
ऋषि दयानन्द को गुरुने सुप्रकाश का मार्ग सुझाया
निज मोक्ष मार्ग को त्यागा, केवल गुरु आज्ञा मानी ॥ विष पिए…
कोई सिक्ख कोई मुस्लिम जैनी कोई हिन्दू कोई ईसाई
अन्धकार में डेरा डाले जा रहे ठगे थे भाई
बहकाते रहे लोगों को पाखण्डी और अज्ञानी ॥ विष पिए..
लानत दी और फटकारा पाखण्डी किए किनारा
शास्रार्थ किए मतवादी था वेद ऋषिको प्यारा
यहाँ खड़े थे लोभी कामी यहाँ ऋषि सत्य संग्रामी ॥ विष पिए..
था मान नहीं नारी का गौओं का वध करते थे
दुःखियों को सताते अभिमानी दुराचारी मद करते थे
संघर्ष की ऋषि ने ठानी दुर्दशा सही पहचानी ॥ विष पिए…
परमेश्वर की सत्ता पर ना जाने कितने मत थे
सब अपनी बात मनाने अपने स्वार्थ में रत थे
वेदों के तर्क से निखरी वेदों की ईश्वर वाणी ॥ विष पिए…
उस ओर थे स्वार्थी अधर्मी इस ओर थे ऋषि सुकर्मी
धूतों को चली न मरजी फिर ऋषि को दिए जहर भी
ऋषि ने तो केवल ठानी ऋत् सत्य की ज्योत जलानी ॥ विष पिए…
यह बात सिद्ध की ऋषि ने ईश्वर अवतार न लेते
ना पिता कोई ईश्वर का ना ईश्वर बनते बेटे
ईश्वर अविनाशी अजन्मा इसमें न कोई हैरानी ॥ विष पिए…
जब पूछा फिरंगियों ने क्या कष्ट यहाँ तुम्हें ऋषिवर
तब कहा कि राज गुलामी का ना हुआ कभी है बेहतर
तुम छोड़ो भारत देश को मजूर नहीं है गुलामी ॥ विष पिए…
सोलह विष प्याले पीकर बदले में अमृत-बाँटे
ऋषि बना धर्म का प्यारा दुःख पाकर भी सुख बाँटे
जब अन्तिम जहर पिया तो कह गए वो जाते जाते
ना त्यागना तुम वेदों को आओ हम प्रण करते हैं
थे धर्म के ऋषि दीवाने योगी ऋषि तपी थे स्वामी
ना भूले जग दयानन्द को इसलिए कही ये कहानी
दयानन्द दयानन्द की जय हो दयानन्द, दयानन्द, दयानन्द










