ऐ मन ओ३म् नित जपना (2)

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ऐ मन ओ३म् नित जपना (2)

तर्ज: लगन तो से लागी

ऐ मन ओ३म् नित जपना (2)
कर प्रभु से प्यार जीवन सुधार पछताएगा तू वरना ॥ ऐ मन…

सुत नारी सोना चाँदी घरबार के सपन सजाए
त्याग अहिंसा प्रेम दया के क्यूँ ना रतन कमाए
आत्मिक रत्नों से ऋषियोंने राह प्रभु की खोजी ॥ ऐ मन…

भटक भटक जन्मों से हारे भोगे सुख-दुःख सारे
आए जितने भक्त शरण में इक इक करके तारे
सदा समर्पित भक्त पे क्यूँ कर प्रभु कृपा ना होगी? ॥ ऐ मन…

सत्यज्ञान पाले वेदों से प्रीत प्रभु से होगी
जिसके कारण जन्म मिला है सद्‌गति भी हो होगी
श्रद्धा प्रेम से हो प्रभु आश्रित ना बन जाना भोगी ॥ ऐ मन…

अन्तरिक्ष द्युः पृथ्वी में भी ओ३म की जलती ज्योति
ओ३म् से मन बुद्धि आत्मा भी सदा प्रकाशित होती
ओ म् ही पालक ओ३म् ही रक्षक ओ३म् ही मित्र सह्योगी ॥ ऐ मन…