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राये अग्ने महे त्वा दानाय समिधीमहि।
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ईडिष्वा हि महे वृषं द्यावा होत्राय पृथिवी।।
तर्जः पूमानमे उरू राग मेयुमता
आग जलाई हमने इसलिये कि दान करें
यज्ञभावनाओं का ये हृदय सम्मान करे
कितना है विशाल यज्ञ का नित प्रवाह प्रतिपल ॥ ॥ आग ॥
अपने आपको जब तक हम, नहीं समझते, विश्व का अङ्ग
कर नहीं सकते यज्ञ
हर समय रोम रोम हमारा, यज्ञ भावों से ही सँवरा
बस उसकी चिंगारी बनें ॥
॥ आग ॥
भौतिक जग का, भौतिक ताप, आश्रय जिसे, अग्निदेव का प्राप्त
अग्नि वो आध्यात्मिक;
योगी को हार्दिक लपटें दिख रहीं धूनी के जैसे
हृदय में सतत् जले॥
॥ आग ॥
हे अग्निदेव! तुम मेरे, छोटे से कुण्ड में, खूब जले
ज्योति के दर्शन दिये
किया यज्ञ तो ये जाना, होवे ‘अयंत इध्म आत्मा’
आत्मा तेरा ईंधन बने
॥ आग ॥
तुम ही जानो मेरे सूखे काठ से, हुए तुम प्रदीप्त हो या तो नहीं
पर इतना तो मैं जानूँ
जो जल रही समिधा सतत तेरी ही तो है आत्मा वो
आत्मवान् अग्निदेव अरे!
॥ आग ॥
झाँकियाँ देखें मानस नैन, झाँकियों ने किया बेचैन
पूर्ण दर्शन किमि होय ?
आत्मवान् अग्नि देव की लपटें, इक झाँकी में कैसे समाये ?
दर्श को जिया मचले॥
॥ आग॥
दो समिधाएँ करो स्वीकार, पृथ्वी लोक की व द्युः पार
फूँक दूँ लोक-परलोक,
फूँक दूँ जमीन और आसमान फूँक दूँ शरीर दे दूँ आत्मा
तब कहीं दरस मिले।
॥ आग॥
पृथ्वी, मेरा है ये शरीर और द्युलोक आत्मा-धीर
भेंट करूँ परमात्माग्नि में
दे दी है आत्मा इस विश्व को, और दिया है विश्व आत्मा को
दान ये लेन-देन करे॥
॥ आग॥
अग्निदेव की प्रिय झाँकी, समा रही अङ्ग अङ्ग में
बना के निज ईंधन
व्यापक जिह्वा बनी ज्वाला, हृदय कुण्ड हुआ उजियारा
द्युः पृथ्वी से परे ॥
॥ आग॥
हे अग्निदेव कृपा तुम्हारी, होत्र तुम्हारे के आभारी
होता अद्भुत रमणीय
त्याग-दान की सुन्दर ख्याति,
विश्वप्रेम की झिलमिल झाँकी
जागृत हो जग में॥
॥ आग॥
(यूनी) धुआँ। (किमी) कैसे?। (जिल्हा) जीम। (होत्र) हवन।










