ओ३म् प्र मंहि॑ष्ठाय गायत ऋ॒ताव्ने॑ बृह॒ते शु॒क्रशो॑चिषे ।
उप॑स्तुतासो अ॒ग्नये॑ ॥
ऋग्वेद 8/103/8
आओ मित्रो मिलकर गायें
गायें प्रभु के गीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
भक्ति भाव से परम देव को
निज श्रद्धा की भेंट चढ़ायें
शुचि पावक इस दिव्य नाद से
कोटि-कोटि मन-जीत
जगायें स्वर लहरी में प्रीत
भावभीनीं हैं वैदिक गीतियाँ
अर्चनीय और हैं वन्दारु
उसकी शरण में बैठ के गायें
अमर भक्ति-संगीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
सबसे प्रवर महिष्ठ वो दानी
करता सुकृति वो अभिरामी
सद्गुण-सत्कर्मों का प्रकाशक
साधक होवें प्रदीप्त
जगायें स्वर लहरी में प्रीत
धर्म मिलेगा, सुधन भी मिलेगा
ज्योतिस्वरूप से तेज मिलेगा
सत्याचारी-सत्यज्ञानी प्रभु
करता है वेद-प्रणीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
गगनचुम्बी महत्ता का अधिपति
‘शुक्रशोचि’ है उसकी ज्योति
मानस-पटल पर यदि पड़ जाए
मानस बने प्रदीप
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
कालिमा-मलिनता नष्ट करें प्रभु
अन्तःकरण पवित्र बनाये
अग्रणी प्रभु के स्पर्श से पापी
बन जाए अवलीक
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
सुभग-सुपथ के प्रवर प्रणेता
प्राणीमात्र के तुम्हीं प्रचेता
इन्द्र की गायें महिमा अनवरत
और बढ़ाएँ प्रीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
आओ मित्रो मिलकर गायें
गायें प्रभु के गीत
जगाएँ स्वर लहरी में प्रीत
प्रभु के गीत गाओ आओ हे मित्रों सब मिलकर प्रभु के गीत जाएं। परस्पर मिलकर भक्ति गान की स्वर लहरी उठाने से, तरंगित होकर भक्ति भाव से उस परम देव को श्रद्धा की भेंट समर्पित करने से, वातावरण में जो सुचिता पवित्रता और दिव्यनाद का गुंजन होता है, उसमें कोटि-कोटि मानवों के मनों को प्रभावित करने की शक्ति रहती है।अत:आओ,भावभीनी वैदिक गीतिओं से अग्निस्वरूप तेजस्वी प्रभु की अर्चना वन्दना करो, उपस्तुत बनकर प्रशंसित जीवनवाले होकर उसके चरणों में भक्ति- प्रसूनों की अंजली अर्पित करो।
वह प्रभु ‘महिष्ठ’ है, सबसे बड़ा दानी है। तुम जो कुछ मांगोगे, वह उससे तुम्हें मिलेगा। उससे तुम्हें सद्गुणों का प्रसाद मिलेगा,सत्कर्मों का प्रकाश मिलेगा
तेजस्विता का वरदान मिलेगा धन मिलेगा, धर्म मिलेगा, दिव्य आनंद मिलेगा, वह प्रभु ‘ऋतावा’ है, सत्यज्ञान और सत्य -आचरण वाला है। वह तुम्हें भी सत्यज्ञान और सत्य- आचरण का उपहार देगा। वह ‘बृहत्’ है, महान है, वह सर्व अतिशायिनी गगनचुंबी महत्ता का अधिपति है। वह ‘शुक्रशोचि:’ है पवित्र ज्योति वाला है। उसकी ज्योति की किरण जिसके भी मानस पटल पर पड़ जाती है, उसकी सब कालिमा एवं मालिनता को नष्ट कर उसके अन्दर असीम निर्मलता एवं पवित्रता की आभा को उत्पन्न कर देती है। वह प्रभु अग्नि है, अग्नि के समान पाप- ताप को भस्म करने वाला है, अग्रणी है, पथ प्रदर्शक नेता है।
भाइयों ! तुम भी ‘उपस्तुत’ हो पहले ही अपनी विद्या आदि गुणों के कारण प्रशंसा और कीर्ति अर्जित कर चुके हो। अत: स्वभावत: प्रभु -भक्ति में हमारे साथ मिलकर बैठने में तुम आनन्द अनुभव करोगे।
आओ हम सब समवेत होकर गीतों से उस इन्द्र प्रभु की महिमा को मुखरित करें।










