आओ देवों के मार्ग पर चलें

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आ दे॒वाना॒मप॑ पन्या॑मगन्म॒ यच्छ्न्कवा॑म॒ तदनु प्रवा॑ळहुम् ।

अ॒ग्निवि॒द्वान्त्स य॑जा॒त्सेदु होता सो अ॑ध्व॒रान्त्स ऋतून्कल्पयाति।।

ऋः १०.२.३, अथर्व. १६.५६.३

तर्जः पुरुनरू पुष्पमाय इन्ने पुनीरूम्न (राग-मेघ मल्हार)

यज्ञ के तंतु से बँधे ही रहना देवों का मार्ग है प्यारा (2)
देखो ये सूर्य-चन्द्र अग्नि पृथ्वी संवत्सर कर रहे यज्ञ-उजारा,
आओ देवों का ये मार्ग सदा रखें उघारा॥ ॥ यज्ञ के तंतु॥

इन सारे देवों के यज्ञपालन में होता नहीं है व्यतिक्रम, (2)
ऐसे ही मन बुद्धि प्राणेन्द्रियाँ करें देह-यज्ञ का शिव संगठन,
देवों का देव परमात्मा महादेव करता ब्रह्माण्ड-यज्ञ सारा॥

॥ यज्ञ के तंतु ॥

इस मार्ग पर यदि चलने का मन है शक्ति को अपनी तोलो, (2)
इस पर भी यदि तुम स्थिर रह सकोगे तब मार्ग चलने की बोलो,
आत्मा है अग्रणी तेज पुञ्ज अध्वरी यज्ञ बिन ना उसका गुजारा ॥

॥ यज्ञ के तंतु ॥

विद्वान आत्मा है देव मार्गदायी, ज्ञाता है सारे यज्ञों का, (2)
यज्ञ निष्पादन में उसकी कुशलता उसको बना देती ‘होता’
मन्द्र जनों को ना हानि पहुँचाता ऐसा अहिंसक वो न्यारा॥

॥ यज्ञ के तंतु ॥

उध्वर-यज्ञ रचाये शिवात्मा, हर ऋतु में कालानुसार, (2)
काल-अकाल विचारित यज्ञ ही होता है भली प्रकार
आओ बनें पथिप्रज्ञ इसी यज्ञ के, जीवन सफल हो यज्ञ द्वारा ॥

॥ यज्ञ के तंतु ॥

(तंतु) विस्तार, वंश परम्परा (उयारा) खुला हुआ, (व्यतिक्रम) उलटा, पुलटा, अव्यवस्थित

(शिव) कल्याणकारी। (अग्रणी) आगे ले जाने वाला। (अब्बर) हिंसा रहित यज्ञ।

(निष्पादन) प्रस्तुत करना। (‘होता’) यजमान, याजक, यज्ञ करने वाला। (शिवात्मा)

कल्याणकारी आत्मा। (पविप्रज्ञ) विद्वता के मार्ग पर चलने वाला।