आजादी में बरबादी के ढंग हो गये।

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आजादी में बरबादी के ढंग हो गये।

आजादी में बरबादी
के ढंग हो गये ।
भले आदमी जीने से
भी तगं हो गये।। टेक ।।

सारा दिन जंगल में म्हारी
मां बेटी और बहना,
बे फिकरी से काम करें थी
पहर पहर कर गहना,
इब गहणा क्या बिन गहणे भी
मूश्किल हो‌ गया रहना,
हर दम खतरे का चक्कर
जो बचगया उसका लहना,
कोई ना माने कहना
ऊत मलंग हो गये।।1।।

भूल विसर के कभी किसी से
कहीं पाप हो जाथा,
ग्राम की पंचायत में
उसका इनसाफ हो जाथा,
बेईमान लुच्चे गुन्डे से
गाम खिलाफ हो जाथा,
खतावार को दन्ड मिले था
सच्चा माफ हो जाथा,
पाप साफ हो जाथा
नियम सब भंग हो गये।।2।।

पैसे की तो तंगी थी पर
दिल की साहुकारी थी,
आठो पहर अलमस्त रहें थे
ना कोई बीमारी थी,
खुले किवाडों सोवे थे
ना चोरी ना जारी थी,
ना व्यभिचारी पुरूष
कोई ना चरित्र हीन नारी थी,
प्रजा सुखी सारी थी
नियम सब भग हो गये।।3।।

ना रही शर्म लिहाज देख लों
आपा धापी होरे,
धर्म कर्म हुआ लोप निकम्मे
गुन्डे पापी होरे,
पक्ष पात से भरे हुये
कपटी इन्साफी होरे,

प्रेमी अपने गज से नापें
ऐसे नापी होरे,
धर्म खिलापी होरे
पाप वे संग हो गयं ।।4।।