आज मानव ने यह बिगाड़ बना रखा है।(धुन-कव्वाली)
आज मानव ने यह
बिगाड़ बना रखा है।
सार्थक जगत को
खिलवाड़ बना रखा है।
लक्ष्य से अपने उल्टी
दिशा चला जाता है,
पेड़ दुखों के बोये फल
सुखों के चाहता है।
बारूदी ढेर ऊपर
आग सुलगाता है।
छिड़क कर पैट्राल
फिर उसे बुझाता है।
महकते चमन को
उजाड़ बना रखा है।।1।।
यदि शुभ कर्म करना है
तो उसे टालता है,
अशुभ कर्मों को अति
शीघ्र कर डालता है।
और के तिनके को भी
रात दिन उछालता है।
नहीं शहतीर अपनी आंख
का निकालता है।
सुगम पथ स्वयं कंटक
झाड़ बना रखा हैं। ।2।।
और से अपने लिये चाहता है
शुभ कामनाये,
मगर औरों के लिये रखता है
बुरी भावनायें।
नहीं समझे है चाहे
लाख कोई समझाये,
विनाश काले बुद्धि
नाश कवि बतलाये,
सरल जीने की कला
पहाड़ बना रखा है।।
निकम्मे निठल्ले को
ईश्वर का भक्त कहें,
फंसा जो राग-रंग में
उसे विरक्त कहें।
कार्य बिगड़ जाता है
तो बुरा वक्त कहें,
यही होना था प्रेमी
दैविक नजर सख्त कहें।
भक्ति है कल्प वृक्ष
ताड़ बना रखा है।।
रुवाई
मक्खी के मूड में वास है विष का।
दांत विषैले रहे भुजंग में।।
बिच्छू की पूछ में विष रहे प्रेमी।
दुर्जन के विष रहे हर अंग में।।










