आगे बढ़ो बढ़ो आगे यह कुल दुनिया की वाणी है।

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आगे बढ़ो बढ़ो आगे यह कुल दुनिया की वाणी है।

आगे बढ़ो बढ़ो आगे
यह कुल दुनिया की वाणी है।
भारत के मजदूर किसानों,
क्यों मिटने की ठानी है।।
अरबों खरबों के मालिक,
कुछ ना करते, रहते ठाली
तुम दिन और रात कमाते हो


फिर है तुम्हारे कंगाली
उनके तो रहने की
कोठी बनी नये फैशन वाली
मगर तुम्हारे ढारों की
धुएं से रंग रही छत काली
इस उल्टे चक्कर को
देखकर मुझे बड़ी हैरानी है।।1।।
भारत के मजदूर किसानों…

उनके लिये रेशम मखमल
पश्मीने शाल दुशाले हैं
तुम पर फटे पुराने कपड़े
कई-कई टुक्की वाले हैं
उनके भोजन कई तरह के
शाक में सारे मसाले हैं


तुम्हें नमक से सूखी रोटी
गंठों के भी लाले हैं
उनके कुत्तों को भी दूध,
तुम्हें नहीं छाछ का पानी है।।2।।
भारत के मजदूर किसानो…

उनके तो आराम करने के
कमरे न्यारे न्यारे हैं
तुम सब रहो एक कोठे में
उसी में डांगर सारे हैं
उनके हवाई जहाज हवा के
साथ में दौड़ लगारे हैं


नंगे पैरों चलने के
ऊंचे नीचे राह तुम्हारे हैं
तुमने फिर भी ठगों की
अब तक चाल नहीं पहचानी है।।3।।
भारत के मजदूर किसानो…

काम तो मेहनत से करते पर
बिना विचारे करते हो
आप लुटाकर कष्ट कमाई को
फिर दुखड़े भरते हो
ओरों आगे कान दबा लो
घर में लड़-लड़ मरते हो
खून चूसने वाले ठगों से
पशुओं की तरह डरते हो


शोभाराम कहे डूब मरो
धिक्कार यह जिन्दगानी है
भारत के मजदूर किसानों
क्यों मिटने की ठानी है।।4।।