आध्यात्मनुभव

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शृण्वो वृष्टेरिव स्वनः पवमानस्य शुष्मिणः। चरन्ति विद्युतो दिवि। साम. ८६४

तर्जः मेजवाने पाँदळे ओढ्या माधव तमे

साधक की साधना परिपक्व होके मन को (2)
शब्द-आदेश से जोड़े ॥
विमल आदेश प्रभु के, साधक-मनायु सुनते
दौड़े ना बाहर मन के घोड़े॥
॥ साधक की॥

पाप-ताप में झुलसकर आत्मा-अशांत तरसा (2)
वृष्टि बन धर्म मेघ बरसा
ज्वाला अधर्म की वृष्टि से शान्त हो गई (2)
पवित स्नान को मन तरसा
धुलती गई, झुलसी हुई मन की ये कालिमा (2)
बुझ गये पापों के शोले॥
॥साधक की॥

बादलों के बीच नभ में चमके बिजुरिया (2)
चकाचौंध हुए नैन मूँदें
किन्तु साधक के देहाकाश की बिजुरिया (2)
खोले अंतः नैन, मन गूँजे
कौन समझाये ब्रह्मयोग की महिमा (2)
जाने जो, प्रभु को न छोड़े॥
॥ साधक की॥

(शब्द-आदेश) ईश्वरीय वेद श्रुतियाँ (प्रभु आदेश के रूप में)। (परिपक्व) पूर्ण रूप से
तैयार। (पवित) शुद्ध, पूत, पवित्र, सोमस्वरूप। (कालिमा) कालिख । (शोले) आग की
उठती लपटें। (देहाकाश) शरीर में स्थित आकाश। (ब्रह्मयोग) ईश्वर से जुड़ा आध्यात्मनुभव ।
(बिजुरिया) बिजली, तड़ित। (अंतः नैन) आन्तरिक दृष्टि। (धर्ममेय) धर्म रूपी
कल्याणकारी बादल या पर्जन्य।

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