विद्या ही है रूप मनुष्य का,विद्या यश फैलाती है
(१)🪴💐🌹🙏
विद्या से जो वंचित जन है,
अरु करता वो तप दान नहीं।
धर्म नहीं,गुणशील नहीं,
हित,अनहित का ज्ञान नहीं।
मरे हुए के तुल्य मनुष्य वह,
पाता कहीं पर मान नहीं।
“धर्मवीर”पशुओं से निचा,
कहो उसे इंसान नहीं।
(२)🙏🪴💐🌹
विद्या ही है रूप मनुष्य का,
विद्या यश फैलाती है।
विद्या ही धन छुपा पास में,
विद्या गुरु बनाती है।
विद्या ही है इष्ट मित्र,
और दूर देश में साथी है।
विद्या से ही मनुष्य जाति,
बिन विद्या पशु कहाती है।
(३)🙏🪴💐🌹
संगत जन को बुद्धि देती,
जड़ता दूर हटाती है।
संगत सबको ऊंचा करती,
वाणी मधुर बनाती है।
संगत से प्रफुल्लित मन हो,
जड़ से पाप नाशाती है।
संगत से”धर्मी”बन जाता,
मुक्ति द्वार दिखाती है।
(४)🙏🪴🌹💐
लक्ष्मी जिसके पास बसत है,
वह जन बड़ा कहाता है।
वो ही सच्चा पंडित है और,
वेद शास्त्र का ज्ञाता है।
उसको ही गुणवान कहें,
उपदेश उसी का भाता है।
“धर्मवीर”धन के ही कारण,
गीत धनी के गाता है।










