आचार्य जगदीश चंद्र बसु: भारतीय विज्ञान के महानायक

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1. प्रारंभिक जीवन और परिवार

1.1 जन्म और परिवार

  • जन्म: 30 नवंबर 1858
  • स्थान: राढ़ीखाल, विक्रमपुर, ढाका (अब बांग्लादेश में)
  • पिता: भगवान चंद्र बसु (डिप्टी कलेक्टर)
  • माता: भुवनेश्वरी देवी

1.2 प्रारंभिक शिक्षा

  • प्रारंभिक शिक्षा गाँव में बंगाली माध्यम से प्राप्त की
  • सेंट ज़ेवियर्स स्कूल, कोलकाता में शिक्षा ग्रहण की

2. उच्च शिक्षा और विदेश यात्रा

2.1 इंग्लैंड में शिक्षा

  • 1880 में इंग्लैंड गए
  • लंदन विश्वविद्यालय से बी.एस.सी उत्तीर्ण किया
  • विश्वविख्यात वैज्ञानिकों के संपर्क में आए

2.2 भारत लौटकर करियर की शुरुआत

  • 1885 में भारत लौटे
  • प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता में भौतिकी के प्रोफेसर बने
  • जातिगत भेदभाव का सामना किया

3. वैज्ञानिक खोजें और अनुसंधान

3.1 रेडियो तरंगों का अध्ययन

  • विद्युत चुम्बकीय तरंगों पर काम किया
  • 1895 में गवर्नर के समक्ष अपने प्रयोगों का प्रदर्शन किया
  • मारकोनी से पहले वायरलेस कम्युनिकेशन के सिद्धांत को प्रदर्शित किया

3.2 अर्धचालकों का प्रयोग

  • सबसे पहले रेडियो सिग्नल पकड़ने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग किया

3.3 माइक्रोवेव अनुसंधान

  • 5 मिमी तरंग दैर्ध्य उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त की

4. वनस्पति विज्ञान में योगदान

4.1 क्रेस्कोग्राफ़ का आविष्कार

  • पौधों की संवेदनशीलता को मापने के लिए यंत्र विकसित किया
  • सिद्ध किया कि पौधे भी संवेदनशील होते हैं

4.2 वनस्पतियों और जीवों में समानता

  • वनस्पति और पशु ऊतकों में समानता सिद्ध की

5. सम्मान और उपलब्धियाँ

5.1 पेटेंट और वैज्ञानिक सम्मान

  • भारत के पहले वैज्ञानिक जिन्होंने अमेरिकी पेटेंट प्राप्त किया

5.2 अन्य उपलब्धियाँ

  • बसु विज्ञान मंदिर की स्थापना की
  • विज्ञान और वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनगिनत योगदान दिए

6. निधन और विरासत

  • निधन: 23 नवंबर 1937
  • उनकी खोजों को आज भी वैज्ञानिक समुदाय में मान्यता प्राप्त है
  • उन्हें रेडियो विज्ञान का पिता माना जाता है

7. निष्कर्ष

आचार्य जगदीश चंद्र बसु केवल एक वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञान और संस्कृति के गौरव थे। उनके योगदानों ने विज्ञान को नई दिशा दी और आज भी उनके सिद्धांतों पर शोध जारी है। उनके जन्मदिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि!

विस्तृत जीवन परिचय

भारतीय मान्यता के अनुसार वनस्पति को भी चेतन और प्राणमय बताने वाले तथा अपने अनुसंधान कार्यों द्वारा संसार को आश्चर्यचकित कर देने वाले महान वैज्ञानिक सर जगदीश चंद बसु का कल जन्मदिन है| उनका जन्म 30 नवम्बर 1858 को ढाका के विक्रमपुर कस्बे के राढीखाल नाम के गांव में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द बसु फरीदपुर में डिप्टी कलेक्टर थे। प्रारम्भिक पढाई के उपरान्त ये पढने के लिए ब्रिटेन गए और लंदन विश्वविद्यालय से बी.एस.सी की परीक्षा उत्तीर्ण की जहाँ पर बसु विश्वविख्यात वैज्ञानिकों के सम्पर्क मे आये। शिक्षा पूरी करके भारत आने पर वे प्रसिध्द प्रेसीडेन्सी कॉलेज में भौतिक विज्ञान के प्रध्यापक के पद पर नियुक्त हो गये।यहाँ जातिगत भेदभाव का सामना करते हुए भी इन्होनें बहुत से महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोग किये। उन्हीं दिनों विद्युत चुम्बकीय तरंगों का आविष्कार हुआ था और प्रो0 हर्ज ने जो प्रयोग किये उनसे विज्ञान जगत में हलचल मची हुयी थी। बसु का ध्यान भी उस ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने भी इस क्षेत्र में प्रयोग प्रारंभ किए। इन्होंने बेतार के संकेत भेजने में असाधारण प्रगति की और सबसे पहले रेडियो संदेशों को पकड़ने के लिए अर्धचालकों का प्रयोग करना शुरु किया। कहा जाता है कि बेतार के तारों का आविष्कार मारकोनी ने किया था ,लेकिन ऐसा नही है। मारकोनी के आविष्कार के कई वर्ष पूर्व 1855 में आचार्य बसु बंगाल के अंग्रेज गवर्नर के सामने अपने आविष्कार का प्रदर्शन कर चुके थे। उन्होंने विद्युत तरंगों से दूसरे कमरे मे घंटी बजाई और बोझ उठवाया और विस्फोट करवाया। बोस के माइक्रोवेव अनुसंधान का उल्लेखनीय पहलू यह था कि वे प्रकाश के गुणों के अध्ययन के लिए लंबी तरंग दैर्ध्य की प्रकाश तरंगों के नुकसान को समझ गए इसलिए उन्होंने अपने उपकरणों से 5 मिमी की तरंग पैदा की जो अब तक मानी गई तरंगों में सबसे छोटी थी। इस प्रकार बेतार के तारों के प्रथम आविष्कारक आचार्य बसु ही थे। लेकिन अपनी खोजों से व्यावसायिक लाभ उठाने की जगह इन्होंने इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कर दिया ताकि अन्य शोधकर्त्ता इनपर आगे काम कर सकें। इसके बाद इन्होंने वनस्पति जीवविद्या में अनेक खोजें की। इन्होंने एक यन्त्र क्रेस्कोग्राफ़ का आविष्कार किया और इससे विभिन्न उत्तेजकों के प्रति पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। इस तरह से इन्होंने सिद्ध किया कि वनस्पतियों और पशुओं के ऊतकों में काफी समानता है और पेड़ पौधों में भी जीवन का स्पंदन है। आचार्य बसु के इन प्रयोगों ने वनस्पति विज्ञान की एक नयी शाखा को जन्म दिया और पूरा वैज्ञानिक जगत इन अदभुत प्रयोगों से आश्चर्यचकित रह गया। ये पेटेंट प्रक्रिया के बहुत विरुद्ध थे और मित्रों के कहने पर ही इन्होंने एक पेटेंट के लिए आवेदन किया और भारत के पहले वैज्ञानिक बने जिन्होंने एक अमरीकन पेटेंट प्राप्त किया। रेडियो विज्ञान के इस पिता और भारत माता के इस सपूत का 23 नवम्बर 1937 को निधन हो गया पर वे आज भी हम सबके हृदयों में जीवित हैं| हाल के वर्षों में आधुनिक विज्ञान को मिले इनके योगदानों को फिर मान्यता दी जा रही है और सारी दुनिया उनका लोहा मानती है| उनके जन्मदिवस पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि|

~ लेखक : विशाल अग्रवाल

~ चित्र : माधुरी