भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेकों वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिनमें से कई को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल पाया। उन्हीं में से एक थे टंट्या भील, जिन्हें “भारत का रॉबिनहुड” और “टंट्या मामा” के नाम से जाना जाता है।
उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ा और गरीबों की मदद के लिए लूटी हुई संपत्ति उन्हें बांट दी। उनका जीवन साहस, बलिदान और क्रांति की मिसाल है।
टंट्या भील का प्रारंभिक जीवन
टंट्या भील का जन्म 1844 में मध्य प्रदेश के निमाड़ (वर्तमान खंडवा) क्षेत्र में हुआ था। वे भील जनजाति से थे, जो साहसी और स्वतंत्रता-प्रेमी मानी जाती थी। टंट्या बचपन से ही परिश्रमी और तेजस्वी थे। उन्हें शारीरिक कौशल में विशेष रुचि थी, विशेषकर भाला चलाना, तलवारबाजी, चाकू फेंकना और घुड़सवारी में वे निपुण थे।
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब अंग्रेजों ने भारतीयों पर अमानवीय अत्याचार किए, तो टंट्या भील ने इसका प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया। उस समय वे युवा थे, लेकिन उनके मन में गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने की तीव्र इच्छा थी।
टंट्या भील का क्रांतिकारी संघर्ष
टंट्या ने 1874 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह छेड़ा। वे छोटे समूह बनाकर गुरिल्ला युद्ध करते थे। उन्होंने कई बार अंग्रेजों के खजाने को लूटा और उसे गरीबों में बाँट दिया। इसी कारण वे गरीबों के मसीहा बन गए और लोग उन्हें “मामा” कहकर सम्मान देने लगे।
1874 में अंग्रेजों ने पहली बार टंट्या को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया, लेकिन एक साल की सजा पूरी करने के बाद वे और भी अधिक उग्र हो गए। उन्होंने अपने संघर्ष को और तेज कर दिया और अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया।
टंट्या भील के कारनामे
1. अंग्रेजों की ट्रेनों को लूटना
टंट्या ने कई बार अंग्रेजों की सरकारी खजाना ले जाने वाली ट्रेनों को लूटा। उनका तरीका बिल्कुल अद्वितीय था – वे ट्रेन के छत पर चढ़कर, खजाना निकालकर उसे अपने साथियों को दे देते और फिर अंधेरे में गायब हो जाते।
2. गुरिल्ला युद्ध में महारत
टंट्या भील को गुरिल्ला युद्ध की कला में महारत हासिल थी। वे अंग्रेजों पर अचानक हमला करते और पलक झपकते ही जंगलों में गायब हो जाते।
3. अंग्रेजों की जेल तोड़ना
1878 में टंट्या को फिर से गिरफ्तार किया गया, लेकिन वे तीन दिन के अंदर ही जेल तोड़कर भाग निकले। यह उनकी कुशल योजना और साहसिक व्यक्तित्व का प्रमाण था।
टंट्या भील की गिरफ्तारी और बलिदान
लगभग 20 वर्षों तक अंग्रेजों के लिए सिरदर्द बने रहने के बाद, टंट्या को अंततः धोखे से पकड़ा गया। 10 नवंबर 1889 को न्यूयॉर्क टाइम्स में टंट्या भील को “Robinhood of India” के रूप में प्रकाशित किया गया, जो उनकी प्रसिद्धि का प्रमाण था।
उन्हें इंदौर की जेल में रखा गया, जहाँ अंग्रेजों ने उन पर भीषण अत्याचार किए। 19 अक्टूबर 1889 को उन्हें फांसी की सजा दी गई, लेकिन अंग्रेजों ने यह गुप्त रखा कि फांसी कब और कहाँ दी गई।
कहा जाता है कि अंग्रेजों ने उनकी लाश को पातालपानी रेलवे स्टेशन (खंडवा) के पास फेंक दिया था, जहाँ आज उनकी समाधि स्थित है।

टंट्या भील की विरासत
आज भी टंट्या भील का नाम आदिवासी समाज में सम्मान के साथ लिया जाता है। पातालपानी रेलवे स्टेशन पर जब भी कोई ट्रेन गुजरती है, तो उसे 2 मिनट के लिए रोका जाता है ताकि लोग टंट्या मामा को श्रद्धांजलि दे सकें।

टंट्या भील पर बनी फिल्में
- 1988 में आई फिल्म – “दो वक्त की रोटी”, जिसमें टंट्या के जीवन को दर्शाया गया।
- 2012 में बनी फिल्म – “Tantya Bhil”, जिसे पाँच भाषाओं में प्रसारित किया गया।

निष्कर्ष
टंट्या भील न केवल एक महान क्रांतिकारी थे, बल्कि एक ऐसे नायक भी थे जिन्होंने अपने लोगों के लिए संघर्ष किया। वे गरीबों के लिए एक उम्मीद की किरण थे और अंग्रेजों के लिए एक भयावह दुश्मन।
आज हमें ऐसे वीर सपूतों के बलिदान को नहीं भूलना चाहिए। उनका जीवन हमें प्रेरणा देता है कि अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
जय हिंद! जय हिंदुत्व! वंदे मातरम्!

विस्तृत जीवन परिचय
आज़ादी के लिए नाजाने कितने भारत माँ के लाल बलिदान हो गए , पर दुर्भागय से आज उनका कोई नाम बी नहीं जानता …..
टंट्या भील जिसने अंग्रेजो से लोहा लिया ,उनके विरोध आवाज़ उठाई , वह उन हजारो क्रान्तिकारीयो में एक थे जिन्होंने अंग्रेज़ो को छट्टी का ढूढ याद दिला दिया था ….
टंट्या भील का जिसे टंट्या मामा या कहे भारत का रॉबिनहुड बी कहा जाता है …. का जन्म Madhya pradesh के Nimad क्षेत्र में 1844 को हुआ …
टंट्या के जीवन में बदलाव तब आया जब अंग्रेज़ो ने 1857 में अत्याचारो की सारी सीमाएं लांग दी ….
और तब टंट्या ने अंग्रेजो के खिलाफ जंग छेड़ दी …
1874 में उन्हें पहली बार जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया ….
एक साल की जेल के बाद तो टंट्या के अंदर की चिंगारी शोला बन चुकी थी
और फिर टंट्या मामा ने अपना काम और जोरो शोरो से शुरू कर दिया ……
टंट्या ने अनेको बार अंग्रेजो की खजाना लेती हुई ट्रेन को लूटा , और फिर उन खजाने को गरीबो और ज़रूरतमंदों में बाँट देते थे । 1878 में फिर उन्हें जेल डाला गया पर वो वहा से तीन ही दिन के अंदर भाग निकले …
टंट्या को गोरिला लड़ाई , भाला चलाना, चाकू चलाने में महारत हासिल थी , इसके इलावा मामा को बन्दूक चलने में भी महारत हासिल थी ….
टंट्या भील ने अंग्रेजो ने नाक के नीचे से कई बार चलती ट्रेन से खजाना लूटा , कई बार उन्हें जेल डाला गया पर हर बार वो भागने में कामयाब रहे …
टंट्या के इन्ही कारनामो से वो पुरे भारत में प्रसिद्ध हुए और उन्हें टंट्या मामा का नाम मिला … लोग उन्हें मामा के कर पुकारते थे ….
तक़रीबन 20 साल की कड़ी मुशक्कत के बाद टंट्या भील को पकड़ा गया …
टंट्या मामा के पकडे जाने की खबर अंग्रेजी अख़बार न्यू यॉर्क टाइम्स new york times में छपी जिसमे उन्हें ROBINHOOD OF INDIA के नाम से 10 नवंबर 1889 में प्रसारित किया गया था …
indore के जेल में उन्हें अनेको यातनाऐं दी गयी ,
और फिर उन्हें 19 oct. 1889 को फांसी की सजा दे दी गयी …. अंग्रेजी सरकार को इतना डर था की आज तक ये पता नहीं चल पाया की उन्हें फांसी कब और कहा दी गयी …..
कहा जाता है उन्हें पातालपानी रेलवे स्टेशन खंडवा रूट पर उनकी बॉडी को फेंक दिया गया था … उसी जगा टंट्या मामा की समाधी बनी हुई है
वहा आज भी जब कोई ट्रेन वहाँ से गुजरती है तो मामा को श्रदांजलि के लिए ट्रेन को 2 मिनट के लिए ट्रेन को रोका जाता है ….
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टंट्या मामा पर 2 फ़िल्म बी बन चुकी है
1988 में DO WAQT KI ROTI
2012 में TANTYA BHIL जिसे पांच भाषा में प्रसारित किया गया ….
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जय हिंदुत्व …जय हिन्द … वन्देमातरम ….










