मुख्य भूमिका
भारत के सामाजिक और शैक्षिक उत्थान में अनेक महापुरुषों और महापुरुष तुल्य महिलाओं ने योगदान दिया है। इन्हीं में से एक महान विभूति थीं बहन सुभाषिणी देवी,
जिन्होंने अपना पूरा जीवन नारी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया। उनके त्याग, समर्पण और अदम्य साहस ने हरियाणा के एक साधारण गांव खानपुर कलां को एक शिक्षा नगरी में परिवर्तित कर दिया। उनके योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने वर्ष 1975 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
बहन सुभाषिणी देवी का जन्म 14 अगस्त 1914 को हरियाणा के सोनीपत जिले के माहरा गांव में एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता भक्त फूलसिंह महाराज ने 1920 में वानप्रस्थ धारण कर दिया और जीवनभर शिक्षा और आर्य समाज के प्रचार-प्रसार में संलग्न रहे।
सुभाषिणी देवी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कन्या गुरुकुल देहरादून, शांति निकेतन (टैगोर का संस्थान) और साबरमती आश्रम में प्राप्त की। इन महान संस्थानों के शिक्षा दर्शन ने उनके मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी और उन्होंने स्वयं एक शिक्षण संस्थान स्थापित करने का संकल्प लिया।
शिक्षा के क्षेत्र में संघर्ष और समर्पण
धनाभाव के कारण 1935 में उन्होंने जींद जिले के एक राजकीय प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका के रूप में कार्यभार संभाला। इस पद पर रहते हुए उन्होंने जो भी धन अर्जित किया, वह अपने पिता को सौंप दिया, जिससे भक्त फूलसिंह जी ने खानपुर कलां में कन्या गुरुकुल की स्थापना की।
लेकिन वर्ष 1942 में भक्त फूलसिंह महाराज के बलिदान के बाद, यह गुरुकुल पूरी तरह से बहन सुभाषिणी देवी के कंधों पर आ गया। उन्होंने अपने सरकारी पद का त्याग कर खानपुर कलां के घने जंगलों में 13 छात्राओं और 13 बीघा भूमि के साथ कन्या गुरुकुल को चलाने का संकल्प लिया।
उनके इस कार्य में समाज के अनेक आर्य सज्जनों और भजनोपदेशकों ने सहयोग दिया, जिनमें प्रमुख थे चौधरी ईश्वरसिंह गहलोत, स्वामी नित्यानंद जी, कुंवर जौहरी सिंह जसराणा और चौधरी माडूसिंह मलिक। भोजन और धन की कमी को पूरा करने के लिए आर्य समाज की भजन मंडलियां पूरे हरियाणा में घूम-घूमकर सहयोग जुटाने लगीं।
गुरुकुल का विस्तार और उपलब्धियाँ
बहन सुभाषिणी देवी के अथक प्रयासों से 1948 तक गुरुकुल में छात्राओं की संख्या 200 हो गई और 400 बीघा भूमि जुड़ गई। उन्होंने न केवल छात्राओं को शिक्षा दिलाने पर ध्यान दिया, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया। छात्राओं को स्वच्छता, धुलाई, आत्मनिर्भरता और पाश्चात्य शिक्षा के समावेश के साथ भारतीय संस्कृति का ज्ञान दिया जाने लगा।
1950 के दशक में उन्होंने गुरुकुल को और मजबूत करने के लिए पक्के भवनों का निर्माण करवाया। कालांतर में इस गुरुकुल ने एक उच्च विद्यालय, बहुमुखी अध्यापक प्रशिक्षण महाविद्यालय, स्नातक महाविद्यालय, आयुर्वेदिक महाविद्यालय और गृह विज्ञान महाविद्यालय का रूप ले लिया।
आज, यही संस्थान एक महिला विश्वविद्यालय के रूप में विकसित होकर पूरे भारत में अपनी ख्याति बिखेर रहा है। हरियाणा के इस पिछड़े क्षेत्र में बिजली, पानी, संचार और अन्य सुविधाओं की उपलब्धता का श्रेय भी बहन सुभाषिणी देवी के प्रयासों को जाता है।
राष्ट्रीय सम्मान और विरासत
महिला शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 1975 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। उनकी यह उपलब्धि सिर्फ हरियाणा ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय बनी।
बहन सुभाषिणी देवी ने जीवनभर शिक्षा की अलख जगाई और अपनी अंतिम सांस तक गुरुकुल के विकास के लिए कार्य करती रहीं। उनके अथक प्रयासों ने हरियाणा की महिलाओं को शिक्षित और सशक्त बनने का मार्ग प्रशस्त किया।
निष्कर्ष
बहन सुभाषिणी देवी का जीवन हमें यह सिखाता है कि संकल्प और सेवा भाव के साथ कोई भी असंभव कार्य संभव किया जा सकता है। उनका संघर्ष, समर्पण और शिक्षा के प्रति अडिग विश्वास आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत रहेगा। आज जब हम नारी सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो बहन सुभाषिणी देवी जैसी विभूतियों का स्मरण करना अनिवार्य हो जाता है।
हरियाणा और संपूर्ण भारत उनकी इस महान सेवा के लिए हमेशा उनका ऋणी रहेगा।
विस्तृत जीवन परिचय
बहन सुभाषिणी देवी, जिन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था
भक्त फूलसिंह महाराज की सुपुत्री
श्रीमती सुभाषिणी का जन्म 14 अगस्त, 1914 माहरा गांव जिला सोनीपत में एक साधारण परिवार में हुआ । इनके पिता भक्त फूलसिंह जी ने 1920 से वानप्रस्थ ले लिया और उन्होंने शिक्षा और आर्यसमाज के हेतु अपने जीवन को अर्पित कर दिया।
इन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा कन्या गुरुकुल देहरादून, टैगोर के शान्ति निकेतन और बापू के साबर मति आश्रम में ग्रहण की। इन महान संस्थानों का प्रभाव इन के मस्तिष्क पर गहरा पड़ा और इन्होंने अपने ढंग से एक आश्रम की शुरुआत करने की योजना बनाई ।
धन का अभाव होने के कारण इन्होंने जीन्द में सन् 1935 में राजकीय प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका का पद संभाला और इस पद पर 1942 तक कार्य किया। इन्होंने अपने द्वारा उपाजित धन को अपने पिता को सोंप दिया। भक्त जी महाराज ने कन्याओं में शिक्षा की कमी देखकर खानपुर कलां में एक गुरुकुल की स्थापना की।
सन् 1942 में इनके पिता शहीद हो गये और गुरुकुल को चलाने का उत्तरदायित्व इनके कन्धों पर आ पड़ा । इन्होंने अपने पिता के प्रशंसकों की इच्छा के विरुद्ध अपने राजकीय पद को त्याग कर खानपुर कलां के गहन जंगलों में गुरुकुल चलाया और गुरुकुल की सेवा में जीवन को व्यतीत करने की कसम उठाई। उस समय गुरुकुल में गिनती के तेरह विद्यार्थी थे और तेरह बीघा जमीन थी। इनके दृढ़ निश्चय को देखकर भक्त फूलसिंह महाराज के प्रशंसकों में चौधरी ईश्वरसिंह गहलोत, स्वामी नित्यानंद जी महाराज, कुंवर जौहरी सिंह जसराणा चौधरी माडूसिंह सिंह मलिक आदि आर्य सज्जन एवं भजनोपदेशकों ने मुख्य भूमिका निभाई। अन्न व धन की कमी होते ही उपदेशकों की भजन मंडलियाँ हरियाणा प्रांत में घुम घुम कर अन्न धन्न एकत्रित करती थी।
बहन जी ने अपने दृढ़ विश्वास और कड़ी मेहनत के आधार पर दूर-दूर जाकर लोगों को अपनी कन्याओं को गुरुकुल में निःशुल्क शिक्षा दिलाने के लिए राजी कर लिया । कन्याओं को सफाई और धुवाई सहित सभी निजी कार्य स्वयं करने पड़ते थे । इनके साथ ही उन्हें माध्यमिक शिक्षा की तैयारी करवाई जाती थी । वास्तव में ये आर्य संस्कृति का पाश्चात्य शिक्षा के साथ सम्मिश्रण करने का अपने ढंग से प्रयोग कर रही थीं। सन् 1948 तक इनके पास छात्राओं की संख्या 200 थी और 400 बीघा जमीन थी ।
वर्षा ऋतु में कच्चे घरों और दल-दल जमीन से शिक्षा कार्य को नुकसान पहुँचता था, इन्होंने सन् 1949 में पक्के घरों को बनाने का फैसला किया। जब से इनके कदम इस दिशा में अग्रसर होते गये ।
इनकी छत्र छाया में इस प्रांगण में एक उच्च विद्यालय, एक बहुमुखी अध्यापक प्रशिक्षण महा विद्यालय एक स्नातक महा विद्यालय, एक आयुर्वेदिक महा विद्यालय और गृह विज्ञान महा विद्यालय थे – ये सभी महिलाओं के लिए होते थे। इनके अटूट प्रयास और त्याग के कारण ही आज खानपुर गांव जो हरियाणा के पिछड़े इलाके में स्थित, रेशमिक क्रियाओं से अंकृत, पक्की सड़कों से जुड़ा हुआ और सभी सुविधानों जैसे बिजली, पानी, सफाई, संचार और मनोरंजन आदि से पूर्ण है । वर्तमान में यह संस्था युनिवर्सिटी का रुप धारण कर अपनी ख्याती बखेर रही है।
हरियाणा में नारी शिक्षा के क्षेत्र में बहन सुभाषिणी जी का योगदान अद्वितीय है । वर्ष 1975 में बहन सुभाषिणी जी को केन्द्रीय सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। हरियाणा ही नहीं अपितु समस्त भारतवर्ष में बहन जी की प्रशंसा की गई। अपनी अंतिम सांस तक बहन जी इस संस्था को अपना श्रम प्रदान करती रही। धन्य है हरियाणा की बेटी।










