1. परिचय
- पूरा नाम: अल्लूरी सीतारामा राजू
- जन्म तिथि: 4 जुलाई 1897
- जन्म स्थान: पन्दरंगी गाँव, विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश
- मृत्यु: 7 मई 1924 (चिंतापल्ली के जंगलों में)
- उपनाम: मान्यम वीरुडू (जंगल का हीरो)
- राष्ट्रीयता: भारतीय
- प्रसिद्धि: रम्पा विद्रोह (1922-1924) के नेता
2. प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
- अल्लूरी सीतारामा राजू का जन्म आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले के पन्दरंगी गाँव में हुआ था।
- उनका झुकाव बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम की ओर था और वे भारतीय क्रांतिकारियों से प्रेरित थे।
- उन्होंने औपचारिक शिक्षा पूरी नहीं की, लेकिन उन्होंने समाज की पीड़ा को समझते हुए आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष का निर्णय लिया।
3. रम्पा विद्रोह और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष
- 1882 के मद्रास फॉरेस्ट एक्ट ने आदिवासियों को वनों में स्वतंत्र रूप से विचरण करने और अपनी पारंपरिक खेती करने से रोक दिया था।
- इससे आदिवासी समुदायों में भारी असंतोष फैल गया और इस असंतोष को दिशा देने का कार्य अल्लूरी सीतारामा राजू ने किया।
- उन्होंने आदिवासियों को संगठित किया और गुरिल्ला युद्ध तकनीकों का उपयोग करके विशाखापत्तनम एवं ईस्ट गोदावरी जिलों में ब्रिटिश शासन को कड़ी चुनौती दी।
- इस विद्रोह के दौरान कई ब्रिटिश अधिकारी मारे गए और बड़े पैमाने पर गोला-बारूद और हथियार लूटे गए।
4. संघर्ष और बलिदान
- अंग्रेजी हुकूमत ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक दी।
- राजू के कई साथी मारे गए या गिरफ्तार कर लिए गए, लेकिन वे अंतिम समय तक संघर्षरत रहे।
- अंततः 7 मई 1924 को चिंतापल्ली के जंगलों में उन्हें घेर लिया गया और गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई।
- मात्र 28 वर्ष की आयु में वे मातृभूमि की बलिवेदी पर बलिदान हो गए।
5. विरासत और प्रभाव
- अल्लूरी सीतारामा राजू आज भी आंध्र प्रदेश और पूरे भारत में साहस और बलिदान के प्रतीक माने जाते हैं।
- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को याद करते हुए सरकार ने उनके नाम पर कई स्मारक और संस्थान स्थापित किए हैं।
- विस्तृत जीवन परिचय
- लोगों के बीच मान्यम वीरुदू अर्थात जंगल का हीरो नाम से प्रसिद्द और 1922 से 1924 के बीच अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध चले आदिवासियों के रम्पा विद्रोह के नेतृत्व करने वाले क्रांतिकारी अल्लूरी सीतारामा राजू का आज जन्मदिवस है| आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के पन्दरंगी गाँव में 4 जुलाई 1897 को जन्मे राजू ने 1882 के मद्रास फारेस्ट एक्ट के विरुद्ध आदिवासियों के क्षोभ को दिशा दे ब्रिटिश शासन की नींद हरम कर दी थी|
- इस एक्ट में आदिवासियों के वनों में निर्बाध विचरण को प्रतिबंधित कर दिया गया था जिससे उनकी स्थान बदल बदल कर की जाने वाली परंपरागत खेती ख़त्म हो गयी और उनके अन्दर विद्रोह की भावना ने जन्म लिया| बंगाल के क्रांतिकारियों से प्रेरणा ले राजू ने इसी भावना को दिशा दे आदिवासियों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए प्रेरित किया और गुरिल्ला पद्धति के प्रयोग से विशाखापत्तनम एवं ईस्ट गोदावरी जिलों में अंग्रेजों को नाकों चने चबबा दिए|
- ना जाने कितने ही ब्रिटिश अधिकारी मारे गए और कितना ही गोला बारूद और हथियार लूटे गए| परेशान अंग्रेजी सरकार ने पूरी शक्ति इस विद्रोह को कुचलने में लगा दी| राजू के कई साथी पकडे गए और कई मारे गए पर राजू अनवरत संघर्ष में लगे रहे | अंत में चिंतापल्ली के जंगलों में राजू को घेर लिया गया और 7 मई 1924 को गोली मार कर उनका अंत कर दिया गया और इस तरह से 28 वर्ष की आयु में मातृभूमि की बलिवेदी पर राजू ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए| आज उनके जन्मदिवस पर उनको कोटिशः नमन |
लेखक: विशाल
चित्र: माधुरी










