
(१)🌹🪴🌳
निजी पिता का गोत्र जहां हो,
वहां ना ब्याहन जाता है।
माता की छह: पीढ़ी का,
विस्तार जहां ना पता है।
ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य का बालक,
वहां पर ब्याह कराता है।
ऐसा करने को “धर्मी”,
महाराज मनु बतलाता है।
(२)💐🌷🪴
ब्राह्मण का सुत आठ वर्ष का,
पहन जानेऊ न्हाता है।
ग्यारह वर्ष का क्षत्रिय बालक,
अपना देह सजाता है।
बारह वर्ष का वैश्य का बालक,
तन की शोभा पाता है।
दुगने वर्षों के पीछे फिर,
हर कोई शुद्र कहाता है।
(३)🪴💐🌴
धर्म-कर्म के करने हारे,
उच्च वर्ण में जाते हैं।
अधर्म के जो करें कार्य,
वह नीचे वर्ण में आते हैं।
जैसा-जैसा कर्म करें हैं,
वैसा ही पद पाते हैं।
कर्म के द्वारा वर्ण बने हैं,
ऋषि मुनि फरमाते हैं।
(४)🌿💐🪴
गुणी मनुष्य के पास में रहकर,
गुण,गुण ही कहलाता है।
दुष्ट मनुष्य के पास में जाकर,
गुण अवगुण बन जाता है।
जब तक नीर नदी में रहता,
मीठा स्वाद कहाता है।
वही जल जलनिधि में जाकर,
खारी नैंक ना भाता है।
वैदिक धर्म में वर्णित वर्णाश्रम व्यवस्था पर एक भजन









