यज्ञ में ओ३म् का प्रयोग कहां किया जाये ?

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आदर व सम्मान के योग्य सभी विद्वतजन सभी को सादर नमस्ते🙏🙏

बहुत दिनों पश्चात आर्य समाज घंटाघर भिवानी में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। मेरे द्वारा कराए गए यज्ञ में आर्य समाज घंटाघर के उप प्रधान आदरणीय वेद प्रकाश जी ने कुछ आपत्तियां प्रकट की और कहा कि- आर्य समाज में आप नई रीति न चलाएं।

आदरणीय वेद प्रकाश जी के इस भ्रम का निवारण प्रस्तुत लेख में किया गया है कि मेरे द्वारा किया गया यज्ञ महर्षि दयानंद की पद्धति के अनुकूल ही है।विषय सरल है परंतु स्वाध्याय के अभाव के कारण ऐसी शंकाएं उत्पन्न हो जाया करती हैं। कृपा लेख पढ़ कर अपने प्रतिक्रिया अवश्य प्रकट करें।

आदरणीय वेद प्रकाश जी का कथन यज्ञ के प्रत्येक मंत्र के आरंभ में ओ३म् का उच्चारण करना चाहिए यही महर्षि का मत है

समीक्षा – ओ३म् का प्रयोग कहां किया जाये ?आर्यसमाज में ‘ओ३म्’ का उच्चारण सन्ध्या, ईश्वर स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन आदि के सब मन्त्रों के प्रारम्भ में प्राय: किया जाता है । ओमभ्यादाने (अष्टा० ८।२ ८७ ) अष्टाध्यायी के इस नियम से विदित होता है कि प्रत्येक कर्म के आरम्भ को द्योतित करने के लिये उस-उस कर्म के लिये विनियुक्त मन्त्र वा मन्त्रसमूह के प्रारम्भ में प्लुत ‘ओ३म् ‘ प्रयुक्त होता है । यथा जहां आहुति देनी होती है, वहां उक्त कर्म उसमें विनियुक्त मन्त्र से प्रारम्भ होता है, और स्वाहा के समकाल आहुति प्रदान पर समाप्त हो जाता है । परन्तु जहां एक कर्म के लिये अनेक मन्त्र विनियुक्त होते हैं, वहां एक कर्म में विनियुक्त मन्त्रों में यदि मन्त्र से पूर्व ही ‘ओ३म्’ का उच्चारण किया जाता है । अर्थात् अन्य मन्त्रों के प्रारम्भ में नहीं बोला जाता है । अगले ‘ओ३म्’ के उच्चारण से पूर्व कर्म की समाप्ति भी देहली-दीप न्याय’ से द्योतित हो जाती है ।ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में इसी प्राचीन परिपाटी को अक्षुण्ण रखा है । यथा – पञ्चमहायज्ञविधि और संस्कारविधि में अङ्गस्पर्श और मार्जन प्रत्येक मन्त्र से भिन्न-भिन्न इन्द्रिय का किया जाता है अत: क्रियाभेद के कारण प्रत्येक क्रिया में विनियुक्त मन्त्र के आरम्भ में ‘ओ३म्’ का निर्देश मिलता है । परन्तु जहां अघमर्षण मंत्र, मनसा परिक्रमा मंत्र, उपस्थान मंत्र, स्तुतिप्रार्थनोपासनारूप एक विषय के अनेक मन्त्र हैं, वहां उस प्रकरण के प्रथम मन्त्र के पूर्व में ही ‘ओ३म्’ का निर्देश किया है । अतः एक कर्म में चाहे कितने ही मन्त्र विनियुक्त हों, उनके प्रथम मन्त्र के पूर्व ही ओ३म्’ का उच्चारण करना चाहिये ।इस बात की पुष्टि महर्षि दयानंद के ग्रंथ करते हैं देखिए –

जहां प्रत्येक मंत्र के आरंभ में ओ३म् के उच्चारण का निर्देश दिया गया है। संस्कार विधि और पंचमहायज्ञ विधि के आचमन मंत्र, इंद्रियस्पर्श मंत्र, मार्जन मंत्र आदि।जहां प्रत्येक मंत्र के आरंभ में ओ३म् के उच्चारण का निर्देश नहीं दिया गया है। संस्कार विधि और पंचमहायज्ञ विधि के ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना , स्वस्तिवाचनाम्, शांतिकरणम्, अघमर्षण , मनसापरिक्रमा, उपस्थान मंत्र आदि अत: सारांश यह है कि जहां-जहां क्रिया का व्यवधान हो तो उसके पश्चात मंत्र उच्चारण करते समय आरंभ में ओ३म् का उच्चारण करना चाहिए परंतु यदि क्रम से वेद मंत्र का पाठ कर रहे हैं और उनके मध्य कोई क्रिया का व्यवधान नहीं है तो प्रत्येक मंत्र के साथ ओ३म् का उच्चारण नहीं करना चाहिए।हम सभी को महर्षि दयानंद द्वारा लिखित ग्रंथों का अध्ययन बड़े ही गहनता के साथ करना चाहिए।धन्यवाद।

✍️✍🏻ब्रह्मचारी शेखर आर्य

विद्यार्थी M.A संस्कृत

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक

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