राजगुरु:

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वीरता और बलिदान की अमर गाथा 🏹🇮🇳

🗓️ 24 अगस्त – यह दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान क्रांतिकारी शिवराम हरि राजगुरु की जयंती के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज है। उन्होंने भारत माता को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया था।

बाल्यकाल एवं शिक्षा 🎓

🗓️ 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के खेडा गाँव में जन्मे राजगुरु का बचपन कठिनाइयों से भरा था। मात्र 6 वर्ष की आयु में उनके पिता का निधन हो गया, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी माता और बड़े भाई ने किया।

बहुत छोटी उम्र में ही वे वाराणसी में संस्कृत और वेदों का अध्ययन करने चले गए। राजगुरु न केवल हिंदू धर्म ग्रंथों के विद्वान थे, बल्कि उन्होंने लघु सिद्धांत कौमुदी जैसे कठिन ग्रंथ को भी कंठस्थ कर लिया था। इसके साथ ही उन्हें व्यायाम और शारीरिक बल बढ़ाने का भी अत्यधिक शौक था। वे छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध शैली से बहुत प्रभावित थे।

क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत 🔥

वाराणसी में रहते हुए राजगुरु का संपर्क अनेक क्रांतिकारियों से हुआ और वे चंद्रशेखर आज़ाद के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि वे उनकी पार्टी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (HSRA) के सदस्य बन गए। पार्टी में उन्हें “रघुनाथ” के छद्म नाम से जाना जाता था।

राजगुरु निशानेबाजी में माहिर थे और अपने शौर्य एवं साहस के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1928 को अंग्रेज़ अधिकारी जॉन सॉन्डर्स का वध किया। इस कार्रवाई के दौरान चंद्रशेखर आज़ाद ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की थी।

पुलिस से बचने का प्रयास और गिरफ्तारी 🚨

सॉन्डर्स की हत्या के बाद, क्रांतिकारियों ने पुलिस को चकमा देने के लिए अलग-अलग वेशभूषा अपनाई:
भगत सिंह – अंग्रेज अधिकारी
राजगुरु – सेवक
चंद्रशेखर आज़ाद – सन्यासी

कुछ समय तक पुलिस को चकमा देने के बाद, भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ असेम्बली में बम फेंकने की योजना बनाई और स्वेच्छा से गिरफ्तारी दे दी। इस दौरान राजगुरु महाराष्ट्र चले गए, लेकिन लापरवाही के कारण वे भी गिरफ्तार कर लिए गए।

अमानवीय यातनाएँ और बलिदान 🩸

गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने राजगुरु पर अत्यधिक अमानवीय अत्याचार किए, ताकि वे चंद्रशेखर आज़ाद के ठिकाने का पता लगा सकें। लेकिन राजगुरु ने किसी भी परिस्थिति में अपने साथियों के नाम उजागर नहीं किए।

आख़िरकार, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सांडर्स हत्याकांड में दोषी ठहराया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।

🗓️ 23 मार्च 1931 – यह वह काला दिन था जब तीनों क्रांतिकारियों को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। लेकिन उनकी शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला को और अधिक भड़का दिया।

राजगुरु की जयंती पर नमन 🙏

आज शहीद शिवराम हरि राजगुरु की जयंती पर हम उन्हें शत-शत नमन करते हैं। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और अपने अदम्य साहस से पूरे राष्ट्र को प्रेरित किया।

🚩 “सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है!”
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जय हिंद! 🇮🇳🔥

24 अगस्त भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी शिवराम हरि राजगुरु का भी जन्मदिवस है जिन्होनें भारतमाता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को हँसते हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया था| राजगुरु का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् 1965 (विक्रमी) तदनुसार 24 अगस्त सन् 1908 में पुणे जिला के खेडा गाँव में हुआ था।

6 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से इनका पालन पोषण इनकी माता और बड़े भैया ने किया | बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे। इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदो का अध्ययन तो किया ही, साथ ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बडे प्रशंसक थे।

वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ । चन्द्रशेखर आजाद से ये इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे।

राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी। कार्यवाही के पश्चात भगत सिंह अंग्रेजी साहब बन कर, राजगुरु उनके सेवक बन कर और चंद्रशेखर आजाद सन्यासी बनकर सुरक्षित पुलिस की दृष्टि से बच कर निकल गए | समय ने करवट बदली और भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त के असेम्बली में बम फोड़ने और स्वयं को गिरफ्तार करवाने के पश्चात चंद्रशेखर आजाद को छोड़ कर सुखदेव सहित दल के सभी सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए | केवल राजगुरु ही इससे बचे रहे जो आजाद के कहने पर पुलिस से बचने के लिए कुछ दिनों के लिए महराष्ट्र चले गए किन्तु लापरवाही के कारण छुटपुट संघर्ष के बाद पकड़ लिए गए |

अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आजाद का पता जानने के लिए राजगुरु पर अनेकों अमानवीय अत्त्याचार किये किन्तु कोई भी कष्ट उन्हें विचलित नहीं कर सका, लेशमात्र भी नहीं| सांडर्स वध के अपराध में राजगुरु ,सुखदेव और भगत सिंह को मृत्युदंड दिया गया और 23 मार्च 1931 को राजगुरु ने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में हमेशा के साथ दर्ज करा दिया। उनकी जयंती पर उनको शत शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

~ साभार : विशाल अग्रवाल