ओ३म् सुख-कन्द से
ओ३म् सुख कन्द से,
सच्चिदानन्द से याचना है,
श्रेयपथ पर चलूँ कामना है।
कृत कुकर्मों की जब याद आती आँख है
अश्रुधारा बहाती मन में सन्ताप की,
घोर अनुताप की वेदना है। श्रेय०
पाया नर-तन, न पर साधना की
कुछ भी मैंने न प्रभु-आराधना की
मन में तृष्णा भरी,
काम-मद-लोभ की वासना है। श्रेय०
भक्तजन की सुनो करुण कविता,
विश्व दुरितों को हे देव ! सविता,
दूर कर दीजिए, भद्र भर दीजिए भावना है। श्रेय०
‘स्वस्ति पन्थामनुचरेम’ भगवन्
सूर्य औ’ चंद्र के तुल्य भगवन्
दान दूँ, ज्ञान लूँ, बन रहूँ प्रार्थना है। श्रेय०
ले चलो सुपथ पै सर्वज्ञाता,
कुटिल अघ से बचूँ सिर नवाता,
‘पाल’ दो आत्मबल,
जिससे होवे सफल साधना है। श्रेय०
























