वारीन्द्रकुमार घोष

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पारिवारिक पृष्ठभूमि और पिता का दृष्टिकोण
वारीन्द्रकुमार घोष और उनके बड़े भाई अरविन्द घोष के पिता डॉ. कृष्णधन घोष एक प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। वे अंग्रेजी शासन के प्रबल समर्थक थे और मानते थे कि अंग्रेजी भाषा, वेश-भूषा, भोजन और संस्कृति को अपनाने से भारतवासियों का कल्याण होगा।
इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने अपने बड़े पुत्र अरविन्द को बाल्यावस्था में ही इंग्लैंड भेज दिया, ताकि वह अंग्रेजी वातावरण में पले-बढ़े। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी को भी इंग्लैंड भेजा ताकि उनका अगला पुत्र वहीं जन्म ले और पूर्णतः अंग्रेजी संस्कारों में ढल सके।
परन्तु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।


जन्म और प्रारम्भिक जीवन : एक विडम्बना
वारीन्द्रकुमार घोष का जन्म सन् 1880 में इंग्लैंड में हुआ। उनका पालन-पोषण और शिक्षा इस उद्देश्य से हुई कि वे पूर्णतः अंग्रेज बनें। किन्तु परिणाम इसके विपरीत निकला। वे अंग्रेज-भक्त नहीं, बल्कि भारत-भक्त बने।
अंग्रेजों की पराधीनता उन्हें असह्य थी। जिस शासन को उनके पिता वरदान मानते थे, वही उनके लिए राष्ट्र की बेड़ियाँ बन गया।


अरविन्द घोष और आई.सी.एस. प्रसंग
डॉ. कृष्णधन चाहते थे कि अरविन्द आई.सी.एस. अधिकारी बनें। अरविन्द ने प्रतियोगिता परीक्षा उत्तीर्ण भी कर ली। किन्तु नियुक्ति हेतु आवश्यक घुड़सवारी परीक्षा में वे सम्मिलित नहीं हुए, जिससे उनका चयन निरस्त हो गया।
सन् 1892 में दोनों भाई भारत लौट आए। अरविन्द अंग्रेजी के अतिरिक्त फ्रांसीसी, लैटिन और ग्रीक भाषाओं में भी निपुण थे। 1893 में वे बड़ौदा नरेश के निजी सचिव बने और बाद में बड़ौदा कॉलेज के उपाचार्य नियुक्त हुए।
वारीन्द्र भी उनके साथ बड़ौदा में रहे। उन्हें संगीत से विशेष प्रेम था; वे सुरीले गायक और कुशल सितारवादक थे।


राजनीतिक चेतना का विस्फोट
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में भारत में राजनीतिक जागरण तीव्र हो रहा था।
1875 में आर्य समाज की स्थापना,1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस का गठन,1900 में स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा गुरुकुल की स्थापना
इन सब घटनाओं ने वातावरण को आंदोलित कर दिया था। बंगाल विशेष रूप से क्रान्तिकारी गतिविधियों का केंद्र बन रहा था।
वारीन्द्र और अरविन्द दोनों ने अनुभव किया कि सशस्त्र क्रान्ति ही अंग्रेजों को परास्त कर सकती है।


बंगाल की ओर और क्रान्ति की तैयारी
सन् 1903 में वारीन्द्र बंगाल गए, परंतु उस समय अनुकूल वातावरण नहीं मिला।
1905-06 में लार्ड कर्जन द्वारा बंग-भंग की घोषणा ने राष्ट्रवादी भावना को भड़का दिया। इसी पृष्ठभूमि में वारीन्द्र ने कलकत्ता में एक आश्रम स्थापित किया, जहाँ युवकों को धर्म, योग, व्यायाम के साथ-साथ लाठी, तलवार आदि शस्त्रों का प्रशिक्षण दिया जाता था।
राजनीतिक संगठन को आध्यात्मिक आवरण प्रदान किया गया।


‘युगान्तर’ और अग्नि-साधना
1907 में वारीन्द्र ने ‘युगान्तर’ नामक मासिक पत्र निकाला, जो अत्यंत लोकप्रिय हुआ। इसके संपादक भूपेन्द्रनाथ दत्त थे, जो स्वामी विवेकानन्द के छोटे भाई थे।
उधर आश्रम में बम निर्माण का कार्य प्रारम्भ हुआ। उल्लासकर दत्त और हेमचन्द्र दास कानूनगो जैसे युवकों ने इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाई। हेमचन्द्र दास तो बम निर्माण की शिक्षा लेने फ्रांस तक गए।क्रान्ति की यह अग्नि धीरे-धीरे भड़कने लगी।


किंग्सफोर्ड प्रकरण और अलीपुर बम कांड
कोलकाता के प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड क्रान्तिकारियों को कठोर दंड देने के लिए कुख्यात थे। उन पर बम हमला हुआ, परन्तु दुर्भाग्यवश लक्ष्य चूक गया और निर्दोषों की मृत्यु हो गई।
इसके बाद अंग्रेज सरकार ने व्यापक गिरफ्तारियाँ कीं। वारीन्द्र, अरविन्द तथा अनेक क्रान्तिकारी पकड़े गए।
इस ऐतिहासिक मुकदमे को अलीपुर बम कांड के नाम से जाना गया। 6 मई 1909 को वारीन्द्रकुमार घोष सहित कई क्रान्तिकारियों को फाँसी की सजा सुनाई गई, जो बाद में आजीवन कारावास में बदल दी गई।उन्हें अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेजा गया।


स्वीकारोक्ति और मानवीय संवेदना
जांच के दौरान निर्दोष लोगों पर अत्याचार होते देख वारीन्द्र का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने पुलिस के समक्ष संगठन की गतिविधियों का विस्तृत बयान दे दिया।
उनकी इस स्वीकारोक्ति ने न्यायालय को निर्णय देने में सहायता दी, किन्तु इससे उनके क्रान्तिकारी जीवन पर एक संवेदनशील अध्याय भी जुड़ गया।


कारावास, मुक्ति और साहित्य
1920 में वारीन्द्र घोष को भारत लाया गया। रिहाई के बाद वे कुछ समय पांडिचेरी स्थित अरविन्द आश्रम में रहे।
अपने कारावास का वृत्तांत उन्होंने ‘मेरी निर्वासन कहानी’ नामक पुस्तक में लिखा, जिसमें अंडमान की यातनाओं और क्रान्तिकारी जीवन का मार्मिक चित्रण है।


उपसंहार
वारीन्द्रकुमार घोष का जीवन एक अद्भुत विडम्बना का प्रतीक है—
जिसे अंग्रेज बनाने के लिए इंग्लैंड में जन्म दिलाया गया, वही युवक अंग्रेजी साम्राज्य का प्रखर शत्रु बन गया।
उनका जीवन इस सत्य को प्रमाणित करता है कि जन्मभूमि की पुकार अंततः हृदय में जाग ही उठती है।