जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम ।
ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ॥ १॥ अथ. १/३४/२
तर्जः मधुमागसी माझा सख्या तरी
माधुर्य प्राप्ति में लगा दूँ मैं, भर दो मधुरस हे माधुरी !॥
मन में जागे मधु-सत्कृति॥
॥ माधुर्य॥
जीवन में घुल मिल जाओ तुम, मन बुद्धि को मधुर बनाओ (2)
जब बोलूं मीठा ही बोलूं, सत्य प्रतिज्ञ ये होवे मति॥
॥ माधुर्य॥
जीभ के अग्रभाग में मधु हो उससे अधिक हो मिठास मूल में (2)
व्यवहारों में ना हो दिखावा (2) वचन मधुर हों सरल, सुचि॥ ॥ माधुर्य॥
यदि जिह्वाग्र हो प्रेम-परियत्त, मूल में ना फिर द्वेष-द्रोह हो। (2)
बनावटी माधुर्य से बेहतर (2) मन से उठी कटुता ही सही॥ ॥ माधुर्य ॥
मत्सर-मन माधुर्य क्या जाने सुक्त सखित्व को क्या पहचाने? (2)
स्वार्थ बाहुल्य में कर्म हो कलुषित (2) हृदयी किलोल कल काकलि।।॥ माधुर्य ॥
इसलिए मेरी वाणी के मूल में सरसे बरसे मधु का रस (2)
प्रेम भरे मानस-मधु स्रोत से उठे किल्लोल कल काकलि॥ ॥ माधुर्य ॥
हर चेष्टा व्यवहार कर्मकृति मन बुद्धि विमर्ष जगाओ (2)
वास करो सुसिक्त सङ्कल्प में (2) परिपूरित हो सुकृति ॥ ॥ माधुर्य ॥
है चैतन्य चातुर्य जगाओ मधुमय अंतःकरण सजाओ (2)
चित्त प्रदेश में व्याप्त रहो तुम, हे प्रभु मेरे तमोहरि॥ ॥ माधुर्य ॥
(माधुरी) मिठास, सुन्दरता। (सत्कृति) श्रेष्ठ कर्म। (सत्यप्रतिज्ञ) सत्य पसंद करने वाला।
(सुचि) पवित्र। (जिह्वाग्र) जीभ का अगला भाग। (परियत) घिरा हुआ (चारों ओर से)।
(द्रोह) षड्यंत्र, द्वेष। (कृति) रचना। (संशित) कठोर व्रत। (चेतन्य) चित्त स्वरूप आत्मा
सचेत, सावधान। (विमर्श) परामर्श, समालोचना। (सुसिक्त) अच्छी तरह सींचा हुआ।
(मत्सर) ईष्या, किसी का सुख ना देख सकना। (सुक्त) अच्छा बोला या कहा हुआ।
(कत्तुषित) अप्रसन्न करने वाला, अस्वच्छ। (हृष्टि) आनन्द। (किल्लोल) हर्ष,
किलकारी। (कल) अव्यक्त, मधुर ध्वनि। (काकलि) मधुर स्वर। (तमोहरि)
अविद्या, अन्धकार दूर करने वाला। (चातुर्य) चतुराई दक्षता।










