पूर्ण परमात्मा

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पूर्णात्पूर्णमुद॑चति पूर्ण पूर्णेने सिच्यते।

उ॒तो तद्य विद्याम् यत॒स्तत्परिषिच्यते॑

॥29॥ अथर्वः १०.८.२६

तर्जः मळयुड़ी मिडिमनचिराडिल

(राग-यमन)

आओ हम सब ये जानें, परिपूर्ण है संसार
कोई त्रुटि ना कमी है क्योंकि प्रभु हैं आधार
परिपूर्णता उसकी कर सकें ना अनुभव
क्या समझ सकेंगे पूर्ण पुरुष का प्यार
(तन न नन नन)
॥आओ हम ॥

दृष्टि चाहे हमारी होती भिन्न-भिन्न
पर समूची सृष्टि दीख रही अविच्छिन्न
जब पूर्ण पुरुष ने रचा है जगत
फिर तो कैसे न होगा कहो परिपूर्ण
रख दिया ना केवल, रचना करके जगत (2)
उसे सींच रहा है प्रभु सर्वाधार ॥
॥ आओ हम ॥

हमने जान लिया है प्रभु हैं निपुण
जग-जवन को हमारे लिये लिया चुन
आओ पहचाने परिपूर्ण पालक को हम
उसके पथ का पथिक बन हो सार्थक जनम
उसकी फुलवारी के बनते जाएँ सुमन (2)
उसकी कृतियाँ कृपामय बनी हैं उदार
॥आओ हम ॥

(जवन) वेग युक्त। (अविच्छिन्न) अखण्डित।