मस्त मनीषी

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अभि सोमास आयवः पव॑न्ते॒ मद्यं मद॑म् ।

समुद्रस्याधि॑ि वि॒ष्टप॑ मनीषिणौ मत्सराः स्व॒र्विदः

॥ साम. ५१८,८५६ ऋ.८.१०७.१४

तर्जः मळयिल रात्री मळयिल कुडियुम

(राग-मेघ मल्हार)

संयम में है मस्ती, सोमरस में जो झरती
भीजे, रस में हरदम, रहे बस में मन
गुज़रे हँस के जिन्दगी॥ ॥ संयम में॥

भोग विलासों के हलाहल को, पीता ही नहीं मनीषी
प्रेम पियाला, मुँह से लगा ले (2)
अमृत रस है विनयन, संयम अहिंसन॥ ॥ संयम में॥

सच्चा मनीषी है हर्ष-सरोवर, गति मति में झरे मस्ती
हृदय तरंगों की चोटी पर (2)
जागे उसकी उमंग आनन्द व तरंग ॥ ॥ संयम में॥

चलता फिरता सोम का झरना, मानुष जीवन कहलाए
विष का प्याला फिर क्यों है पीना (2)
सोम का कर ले सवन ऋतवन् मधुमन् ॥ संयम में॥

सोम का रस संचारी रस है, खुद पीते और पिलाते
‘ये पचन्ति आत्म कारणात्’
अच्छा नहीं ये प्रसंग, अवसन्न है विषम ॥ ॥ संयम में॥

भक्त भी बालक है कहलाता, खुद हँसता व हँसाता
सबको हँसाये रख तू हरदम (2)
हर्षित रख हृदि-मन आत्मन्, अविपन्न ॥ ॥ संयम में॥

(विषम) भयानक, कष्टदायक। (हलाहल) बहुत तीव्र विष। (मनीषी) बुद्धिमान, पण्डित ।
(ऋतवन) नियमों पर चलने वाला। (संयम) हानिकारक वस्तुओं से बचना।
(संचार) गमन गति। (अविपन्न) स्वच्छ, विशुद्ध ।