अश्वी रथी सुरूप इद्, गोमा इदिन्द्र ते सखा ।
श्वात्रभा वयसे सचते सदा इन्द्रो याति सभामुप
॥ ऋ. ८.४.६
तर्जः मकयित निरयुम पुड पोले (श्रेया)
हे परमेश्वर इन्द्र हो तुम, अखिल जगत सम्राट हो तुम
तेरे सखित्व का फल है महान कर लें स्थापित इसे प्रिय भगवन्
ललित मनोहर सुन्दरतम सख्य तुम्हारा है परिपावन
है शरीर रथ, प्राण हैं अश्व, प्रभु के सखितव से बनता प्रशस्त
व्याधियों की चोटों से जर्जर, कभी ना होता ये बल-रथ
हाँऽऽऽ बनता सुरूप तेरे अनुरूप बनता मोहन तेरे संग
परोपकार सज्जनता साधे, सीखता है जीने का ढंग
हे परमेश्वर…
सखा प्रभु का बन जाता है प्रभु के सख्य से ही ‘गोमान्’
भरे ही रहते सखा के कोठे, पाता ही रहता अन्न धन धान
होऽऽऽ, भाव अराति छोड़ के आता दीन दुःखी अन्यों के काम
कर्मशूर चिरजीवी होता प्रभु का सखा है कर्म प्रधान॥
हे परमेश्वर…
सौम्य आह्लादक चन्द्र समान ही बन जाता वो सखा मनोहर
उसकी छटा से प्रभावित होकर लोग समझते उसको धरोहर
हे महाराजाधिराज हे इन्द्र हमपे भी कभी कृपा अपनी बरसा
हमें भी सख्य-विभूषित कर के सख्य रूप अमृत छलका॥
हे परमेश्वर…
(अखिल) समपूर्ण। (ललित) सुन्दर, चारू। (प्रशस्त)
उत्तम, अतिश्रेष्ठ। (गोमान्) प्रशस्त गीओं, प्रकाश किरणों, वाणियों, भूखण्डों एवं इन्द्रियों वाला हो जाता है।
(अराति) अदान,
स्वार्थ भाव। (आह्लादक) प्रसन्नता देने वाला। (सौम्य) शान्त। (मोहन) मन को लुभानेवाला।










