श्रद्धा का रहस्य

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श्रद्धां प्रातहवामहे श्रद्धां मध्यदिनं परिं।

श्रद्धा युर्य्यस्य निमहुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः

॥ ऋ. १०.१५१.५

तर्जः जन पळ भर त्हणतील हाय हाय

हे श्रद्धा आओ प्रातः काल
फिर तुम्हें बुलायें सायंकाल
॥फिर तुम्हें ॥

है मध्याह्नन का सूर्य विकसित
है प्रदीप्त श्रद्धा के उपमित
ईश्वर का ही देवदूत बन (2)
संसार की करता जो सम्भाल (2)
॥ हे श्रद्धा ॥

हृदय के अन्तस्तल में आओ
अपने ही सदृश्य बनाओ
निशदिन पावन कर्म कराओ (2)
हे श्रद्धे ! बन जाओ कृपाल (2)
॥फिर तुम्हें॥

ईश भजन या आत्मचिन्तन हो
या जीवन का अर्थपार्जन हो
श्रद्धा से जीवन को जगाओ (2)
रखो हाथ में श्रद्धा की मशाल (2)
॥फिर तुम्हें ॥

बिन श्रद्धा ना कर्म है सात्विक
संसारिक हो या पारमार्थिक
श्रद्धावान की रहे सफलता
श्रद्धा में ही हो चाल ढाल (2)
॥फिर तुम्हें॥

(उपमित) तुल्य, सदृष्य। (अर्वापार्जन) अर्थ संचय।