श्रद्धा का रहस्य

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श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते ।

श्रद्धा हृदय्यश्या कृत्या श्रद्धया विन्दते वसु

॥ ऋ. १०.१५१.४

तर्जः जनपळ भर म्हणतील हाय-हाय

श्रद्धा में अर्पित श्रद्धावान
करते हैं यज्ञ व प्राणायाम
॥ श्रद्धा में॥

प्राणायाम याजन हितकारी
हृदय बना देते अविकारी
उन्नत भाव ही सेवित करते (2)
श्रद्धा का करते अभ्युत्थान (2)
॥ श्रद्धा में॥

भौतिक आध्यात्मिक धन पायें
सद्विचार सदाचार जगायें
सत्य अहिंसा जैसे सुभाव (2)
करे आत्मा को विभूतिमान (2)
॥ श्रद्धा में॥

आओ ऋत्विक हे यजमानो
प्राणायाम को रक्षक मानो
श्रद्धा पुरित यज्ञभाव हों (2)
कांतिमय होवें पुष्ट प्राण (2)
॥ श्रद्धा में॥

(अविकारी) निर्विकार। (अभ्युत्थान) उद्भव, उन्नति। (विभूतिमान) ऐश्वर्यशाली, धनवान।
(ऋत्विक) पुराहित, याज्ञिक कर्मकाण्ड करने वाला। (याजन) यज्ञकर्म।