प्र मंहिंष्ठाय गायत ऋतान्चें बृह॒ते शुक्रशर्शोचिषे । उप॑स्तुतासो अ॒ग्नय॑
। ऋ. ८.१०३.८
तर्जः ब्रह्मा विष्णु आणि महेश्वर
आओ मित्रों गायें मिलकर, गायें प्रभु के गीत
जगायें स्वर लहरी में प्रीत (2)
॥आओ मित्रों॥
भक्तिभाव से परमदेव को निज श्रद्धा की भेंट चढ़ायें (2)
शुचि पावक इस दिव्य नाद से कोटि-कोटि मन जीत
॥ जगायें स्वर ॥
भावभीनी हैं वैदिक गीतियाँ अर्चनीय और हैं वन्दारु (2)
उसकी शरण में बैठ के गायें अमर भक्ति संगीत ॥
॥ जगायें स्वर॥
सबसे प्रवर महिष्ठ वो दानी, करता सुकृति वो अभिरामी (2)
सद्गुण सत्कमों का प्रकाशक, साधक होवें प्रदीप्त॥
॥ जगायें स्वर ॥
धर्म मिलेगा सुधन मिलेगा ज्योति स्वरूप से तेज मिलेगा। (2)
सत्याचारी सत्यज्ञानी प्रभु करता वेद प्रणीत ॥
॥ जगायें स्वर॥
गगनचुम्बी महत्ता का अधिपति ‘शुक्र शोचि’ है उसकी ज्योति (2)
मानस पटल पे यदि पड़ जाये, मानस बने प्रदीप ॥
॥ जगायें स्वर ॥
कालिमा मलिनता नष्ट करे प्रभु, अंतःकरण पवित्र बनाये (2)
अग्रणी प्रभु के स्पर्श से पापी बन जाते अवलीक॥
॥ जगायें स्वर॥
सुभग सुपथ के प्रवर प्रणेता, प्राणीमात्र के तुम्हीं प्रचेता (2)
‘इन्द्र’ की गायें महिमा अनवरत, और बढ़ायें प्रीत॥
॥ जगायें स्वर॥
(बन्दारु) वन्दन करने योग्य। (अभिरामी) मनोहर, मनमोहक (प्रवर) श्रेष्ठ, उत्तम। (महिष्ठ)
सबसे बड़ा। (सुकृति) दया। (प्रणीत) आनीत, सामने प्रतिस्थापित। (शुक्रशोचि) पवित्र ज्योति
वाला। (अवलीक) पाप रहित, निष्पाप। (प्रवेता) बोधक, चेताने वाला, (वरुण)। (सुभग)
आनन्ददायक। (अनवरत) निरन्तर सतत, हमेशां। (प्रदीप) प्रकाशमान, उज्जवल ।










