जागते रहो

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यो जागार तमृर्चः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति।

यो जागार तमयं सोम॑ आह तवाहमस्मि स॒ख्ये न्यौकाः

॥ ऋ. ५.४४.१४ साउ. ६.२.५ सा. १८२६

तर्जः ब्रह्मनंदी तल्लिन भावे

ब्रह्मानन्दी जाग्रत स्वामी, अग्निरूप कहाये (2)
वो अनिद्र त्रिकाल में जाग्रत स्पर्श ना तमोगुण का है
सारी स्तुतियाँ, सभी ऋचाएँ एक प्रभु को चाहें
यश गानों का स्तुतिगीतों का (2) भाजन बनता जाये।
॥ ब्रह्मानन्दी॥

भोगी जग उस अग्निदेव के चरणों में है आश्रित
प्रभु बिन ना किसकी सत्ता है, सब कुछ उसका दायित,
प्रभु-मित्रता में प्रकाश है, (2) प्रभु बिन ठोर ना पायें॥
॥ ब्रह्मानन्दी॥

मनुष्य भी यदि जाग्रत होवे, तमोगुण को हटाकर
चैतन्य अतन्द्र हो जाये, आलस्य दूर भगाकर
कर्तव्यों को तत्क्षण कर के (2) अग्निरूप हो जाये।
॥ ब्रह्मानन्दी॥

इस अलभ्य सुख-भोग के पीछे, ये सारा जग भागे
भोग्य पदार्थ हाथ बाँधकर खड़े सोम के आगे।
जाग्रत पुरुष इन सब पर (2) अपना प्रभुत्व जमाये।
॥ ब्रह्मानन्दी॥

जागो जागो रहो जागृत, तामसिकता को त्यागो
जीवनोदय-अभ्यास करो तुम आलस्यों को भुला दो
जागरुक तो लोक मान्यता मान कीर्ति यश पायें ॥
॥ ब्रह्मानन्दी॥

(भजन) आधार पात्र, बर्ताव। (अतन्द्र) सवेत। (तत्क्षण) उसी समय। (जागरुक) जो
जाग्रत अवस्था में न हो। (अलभ्य) कठिनाई से प्राप्त होने वाला, दुर्लभ ।