पुनानः सौम् जागृ॒विरव्यो वारे परि प्रियः त्वं विप्रो
अभ्वोऽङ्गिरस्तमो मध्वा य॒ज्ञं मिमिक्ष नः ॥ साम. ५१६ ऋ. ६.१०७.६
तर्जः बाँसुरी श्रुति पोले निन स्वरम केल्के उरु
जागृति मेरी जब से उद्भव हो रही, हुए दूर पाप-नष्टकारी
मेरी देह पुरी भी, बनी है निवास जीवन का, जो है सान्द्रकारी॥
वाह जागृति ! वाह जागृति ! ॥
॥ जागृति मेरी॥
तेरी सत्ता की है अङ्ग अङ्ग में अनुभूति आठों पहर हैं रोमाञ्च में हम
रोवें खड़े होते ये सोचते ही के अन्दर है प्यारा हमारा आत्मन्
वाह जागृति ! वाह जागृति ! ॥
॥ जागृति मेरी॥
नस नस में लहरें प्यार की दौड़ें वर्णन करूँ क्या-क्या अनूभूतियों का
देवपुरी के देवों का आनन्द, है कारण तुम्हारी अनुनीतियों
का वाह जागृति ! वाह जागृति ! ॥
॥ जागृति मेरी॥
तुझको बता दें, हम, ऐ श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुझे देख हम यज्ञ करने लगे
मेरे जीवन-यज्ञ के बनके ब्रह्मा, बीज परोपकारी बो दो इसमें
वाह जागृति ! वाह जागृति ! ॥
॥जागृति मेरी॥
यज्ञ ना सूखा रहे हमारा, तेरी सत्ता की हो इसमें मिठास
तुम ही हो तो ब्राह्मण हो और ब्रह्मपुत्र
हो हममें जगा दो निज क्रियाकलाप
वाह जागृति ! वाह जागृति ! ॥
॥ जागृति मेरी॥
प्रेम श्रद्धा ज्ञान से भावना से, मेधावी यज्ञ को परिपूर्ण कर दो
बिन आत्मबोध के जीवन था नीरस याजक इन्द्रियों को माङ्गल्य वर दो।।
वाह जागृति ! वाह जागृति ! ॥
॥ जागृति मेरी॥
(सान्द्रकारी) स्निग्ध करने वाले सुन्दर बनाने वाले। (सतर्क) चौकन्ना। (क्रिया कलाप)
कार्य व व्यापार। (याजक) यज्ञ करने वाला। (मांगल्य) मंगलकारी। (उद्भव) वृद्धि
बढ़ाना। (रोवें) रोंगटे। (अनुनीति) सभ्यता, नम्रता।










