सच्चे यश की नाव

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आ नो अग्ने वयोवृद्धरयिं पावक शःस्यम्

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रास्वा च न उपमाते पुरुस्पृहः सुनीती सुयशस्तरम्॥9॥ साम. ४३

तर्जः बड़किनिंदा मनविल्ला पन्ना

आओ खेल खेला जाए धन का
खेलेगा वो क्या जिसको चिन्ता, धन चोर की,
वसुधन की परिचर्या, जीवन को करे बढ़िया (2)
कोई ईश के धन को चुरा न सके।
याज्ञिक धन में है श्रद्धा अति आनन्दता ।
वसुधन धन की परिचर्या, जीवन को करे बढ़िया।
ध सा नी सा नी म रे सा, रे म प, रे म नी ध प, म प नी
प नी सा, रे सा रे सा रे रे रे रे
है प्रशस्त वही धन यज्ञाग्नि से मिलते
वो पवित्र धन है जिसमें यज्ञकर्म चलते
दोष रहित धन मिलता यज्ञ में
यज्ञशेष के रूप का धन चमके
ऐसे धन से आयु-शक्ति बढ़ी
बुद्धि सधी तो छूटी धोखाधड़ी॥
॥ वसुधन की॥

प्राप्ति और वितरण में, यज्ञ-समिध हो धन
ये दोनों ही बनते हैं, यश वैभव का कारण
लोग ना करते यशी से वैर द्वेष
प्रेम का पात्र वो बनते याज्ञिक देव
शुभकामनाओं की तरणी से
पहुँचें उस द्युलोक की ऊर्मि॥
॥ वसुधन की॥

इस विमान की कामना किसे नहीं होती?
एक को देख के अन्यों को प्रेरणायें होतीं
इस विमान निर्माण में अग्नि देव
अग्रणी हो जाते हैं स्वयमेव
बाढ़ आ जाए सब यज्ञों की
हृष्ट पुष्टता होवे लोगों की॥
॥ वसुधन की॥

(परिचया) सेवा, टहल। (तरणी) तारने का साधन, नाव। (समिध) अर्पण। (ऊर्मि) प्रकाश।
(विमान) द्युःलोक के यात्री का उड़न-साधन (मोक्ष की ओर)।