प्रभो तेरी कृपा का एक कण

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दिवो नु मां वृहतो अन्तरिक्षादपां स्तोको अभ्यऽपप्तद्रसेन ।

समिन्द्रियेण पयसाहमग्ने छान्दोभिर्यज्ञैः सुकृतां कृतेन ॥ अथ. ६.१२४.१

तर्जः बघत राहू दे तुझ्या कड़े

श्रेष्ठ मार्ग की मति तू दे, तुच्छ कामनाओं से घिरे (2)
पूर्ण हुई ना कभी कामना एक मिटी दूजी का सामना॥
तृष्णायें ना कभी मिटें॥
॥श्रेष्ठ मार्ग ॥

तुम विशाल जलनिधी अनन्त हो
प्यासे भक्तों के सुखंद हो
एक बूंद से तृप्त करे (2)
॥श्रेष्ठ मार्ग॥

श्रेष्ठ तुष्टियो के प्रभु हर्षक(2)
ज्ञान सरस रस के हैं वर्षक (2)
निर्झर आनन्द वृष्टि करे
॥श्रेष्ठ मार्ग॥

क्या महत्व है इच्छाओं का ?
कर अनुभव प्रभु-भिक्षाओं का
प्रभु-प्रीत अमृत बरसे (2)
॥श्रेष्ठ मार्ग॥

दिव्य ज्ञानमय बृहद् आकाश से
ज्ञान बिन्दुओं के बहाव से
प्रभु आत्मा संसिक्त करे (2)
॥ श्रेष्ठ मार्ग॥

रसमय शक्ति कणों के द्वारा
आत्म शक्ति को मिले सहारा
ईश्वर सुख संवृद्ध करे (2)
॥ श्रेष्ठ मार्ग॥

आत्मत्याग सुकर्म जगाये
याज्ञिक सच्चा वो कहलाये
आत्मा प्रतिविशिष्ट करे (2)
॥श्रेष्ठ मार्ग॥

(जलनिधी) समुद्र । (सुखद) सुख देने वाला। (तुष्टि) संतोष। (ज्ञानद) ज्ञान देने वाला।
(बृहद) विशाल, बड़ा। (संसिक्त) अच्छी तरह सींचा। (संवृद्ध) बढ़ा हुआ। (प्रतिविशिष्ट)
उत्कृष्ट, सबसे अच्छा। (याज्ञिक) यज्ञ करने वाला।