यस्या॑स्त सन॑ घोरे जुहोम्ये॒षां वृद्धानाभव॒सर्जनाय॒ कम्।
भूम॒िरिति॑ त्वामि॒प्रम॑न्वते॒ जना॒ निर्ऋति॒रिति॑ त्वा॒हं परि॑ वेद स॒र्वत॑ः ॥
अर्थव. ६.४८.१ यजु. १२/६४
तर्जः फुलले रो क्षण माझे फुलले रे
निर्ऋते रे, हे माते निऋते रे! (2)
जगती के स्थूल देवते! (2)
मानव को भोगों में दिखता है आनन्द, सुख की प्रतीति
खाना पीना सन्तति की उत्पत्ति है इच्छायें जी की
आसक्ति में होते केवल जनम जनम के फेरे ॥ ॥ निर्ऋते रे॥
स्थूल जगत में फँसके ना तो मिली है तृप्ति ना ही मोक्ष
या तो फँसा या बँधा जो है आखिर खुद का है दोष
इन देहों के भोगों में ही छाते रहे हैं ये अन्धेरे ॥ ॥ निर्ऋते रे॥
ज्यों ज्यों जकड़ता गया स्थूल देहों में इन स्थूल भोगों में
त्यों-त्यों परिमित हुई शक्तियाँ घेरा इन कष्ट रोगों ने
पशुओं जैसे सुलभ भोगों को मस्ती में भोगे रे॥ ॥ निर्ऋते रे॥
रे निऋते ज्ञान, शक्ति की कमी, देखो मैं घबरा गया हूँ
बन्धन रहित अवस्था को भी मैं निज आत्मा से समझ रहा हूँ
आनन्द भरे, शांत, सुखों के सुदिन तो आते ही जायें मेरे॥ ॥निर्ऋते रे।॥
उत्तम से उत्तम ज्ञान की चाह जगी है मेरे हृदय में
प्रशस्त भावना विस्तृत कर्म करता रहूँ हर समय में
संयम बल से धैर्य सी स्थिर ज्योत जागे हृदय में मेरे ॥ ॥ निर्ऋते रे॥
हे निऋते त्यागमय भोग बन्धन को हवि मैं दे रहा हूँ
तेरे समर्पित भावों को मैं अपनी बुद्धि में ले रहा हूँ।
देते तो, न जग के ये भोग, जीवन में सुख शान्ति आनन्द की सततलहरें ॥
॥ निऋते रे॥
(निऋते) भूमि देवी (माता)। (सन्तति) सन्तान। (प्रशस्त) श्रेष्ठ, उत्तम, प्रशंसनीय।
(स्थूल) जड़। (प्रतीति) आभास (सन्तति) सन्तान। (सुलभ) आसानी से। (सुदिन)
श्रेष्ठ दिन। (प्रशस्त) श्रेष्ठ उत्तम, प्रशंसनीय। (विस्तृत) विस्तार वाला। (धैर्य) धीरज।










