अ॒ग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्वे॑दसम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ।
साम ३. ऋ. १.१२.१
तर्जः प्रेमास में निननिन्जले पूवाग चोकुम्न दिंदे
जब से मेरे, हितू-हृदय में, जागृत हुई यज्ञ-अग्नि
मुझको सुनाई, देने लगा, दिव्य सन्देश ऊर्जस्वी
मुझे अग्निदेव, आह्वान से, देव-संदेश, दे रहा निजि॥
॥जब से मेरे॥
शक्तियाँ, खेल रहीं विश्व के मञ्जुल मंच पर, रही हैं बुला,
देह की, मन और आत्मा की, अग्नि को दूत बना, कहतीं हैं तू आ,
विश्व-याग की आग, देवदूत बनकर, देह आत्मा मन में, हुईं प्रादूर्भूत,
ये आग है विश्ववेदा॥
॥जब से मेरे॥
विश्व की, विधिबद्ध ये सत्ता, आग के द्वारा ही, है विद्यमान,
विश्व की, सत्ता का ये आधार, है मुझमें भी वर्तमान
अपनी सत्ता को, विश्व की सत्ता में करना विसर्जन हे यज्ञकाम !
ये आग है विश्ववेदा॥
॥ जब से मेरे ॥
सब शाकल्य पड़कर ज्वाला में रहता है सुरक्षित, यही है विधान
यज्ञ का चिन्तन मनन निदिध्यासन हो आग्नेय, हे संकल्पवान ।
आदि हो अग्नि अन्त हो अग्नि, संकल्प हो अग्नि, अनुष्ठान हो अग्नि
ये आग है विश्ववेदा॥
॥ जब से मेरे ॥
(हे) विश्वयाग! मेरे जीवन के, यज्ञ का होता बन, कर दे निष्काम
तेरा अदन, अद्भुत दान है, और ये अदन तेरा, बन जाता दान तुझे
हव्य देकर, चिन्ता न रहती, क्योंकि ये आहूतियाँ नष्ट ना होतीं
ये आग है विश्ववेदा।।
॥ जब से मेरे॥
(ऊर्जस्वी) अति बलवान, तेजस्वी। (निजि) शुद्धियुक्त। (मन्जुल) मनोहर, सुन्दर।
(प्रादुर्भूत) प्रकट हुआ हुआ। (विश्ववेदा) विश्व का जानकार। (शाकल्य) हवन की सामग्री
(अदन) खाने योग्य पदार्थ।










