स्वामी नित्यानन्द

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जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

आपका जन्म ग्राम कलोई, तहसील झज्जर, जिला रोहतक निवासी चौ० भुण्डाराम धनखड़ के घर विक्रम संवत् 1948 में हुआ। आपकी माता श्रीमती सरती देवी थीं जो उजोली लालपुर (गुड़गांव) की पुत्री थीं।
आपके पाँच भाई-बहन थे—

  1. न्यौनन्दसिंह
  2. हरनामसिंह (स्वर्गवासी)
  3. घीसूराम
  4. सरूसिंह
  5. घावो देवी (स्वर्गवासी)

विवाह एवं प्रारम्भिक शिक्षा

समय की प्रचलित कुप्रथा के अनुसार आपका विवाह मात्र 12 वर्ष की आयु में ग्राम छपार निवासी दांखादेवी से सम्पन्न हुआ। शिक्षा की समुचित व्यवस्था न होने के कारण आपने सामान्य हिन्दी का ज्ञान अपने पिता (जो फौज में कार्यरत थे) से प्राप्त किया।

आर्य समाज से जुड़ाव

संवत् 1963 के आसपास आर्यसमाज छारा का उत्सव हुआ, जिसमें शास्त्रार्थ और यज्ञोपवीत संस्कार आयोजित किए गए। उसी समय आपके गाँव कलोई में भी पं० जगन्नारायण और कालूराम भजनीक के आगमन से आर्यसमाज का प्रचार हुआ।
आपका संपर्क गुरुकुल झज्जर के संस्थापक पं० विश्वम्भरदास जी से भी हुआ, जिससे आपके जीवन में सत्संग और भजनोपदेश की विशेष रुचि विकसित हुई।

जनेऊ प्रकरण और समाज सुधार

उस समय ब्राह्मण जाति ने जाटों को जनेऊ धारण करने का अधिकार नहीं दिया था। आपने पीपल वृक्ष से उतार कर पुराना जनेऊ धारण किया। बाद में ब्राह्मणों ने धमकाकर यह जनेऊ उतरवा लिया। इस घटना ने आपके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया और आपने स्वयं यज्ञोपवीत धारण किया।
आगे चलकर आपने लाखों लोगों को जनेऊ धारण कराए और ब्राह्मणवादी एकाधिकार को तोड़ा।

आर्यसमाज में योगदान

आप प्रसिद्ध कवि चौ० ईश्वरसिंह ककरोला निवासी के बाप-शिष्य रहे।

आपने भजनोपदेश और सत्संग से लगातार समाज में जागृति फैलाई।

1939 के हैदराबाद आर्य सत्याग्रह में सम्मिलित होकर 3 माह तक सेंट्रल जेल हैदराबाद में रहे।

लोहारू काण्ड में आप पर प्रहार भी हुए, किंतु आप डटे रहे।

आपने गाँव-गाँव पैदल घूमकर आर्यसमाज का प्रचार किया।

परिवार एवं त्याग

भक्त फूलसिंह जी आपकी पत्नी दांखादेवी को कन्या गुरुकुल खानपुर ले गए। उन्होंने लगभग चार वर्षों तक कन्याओं की सेवा की।
संवत् 1982 के आसपास उनका देहांत हो गया।
आपकी दो पुत्रियाँ हुईं, जिनका बचपन में ही निधन हो गया।

संन्यास एवं शिक्षा सेवा

चौ० न्यौनन्दसिंह ने संवत् 1991 में कन्या गुरुकुल खानपुर में स्वामी सुरेन्द्रानन्द जी से संन्यास लेकर “स्वामी नित्यानन्द” नाम धारण किया। आपने कासनी (झज्जर) में कन्या पाठशाला प्रारंभ कर कन्या शिक्षा को बढ़ावा दिया।

संघर्ष और आंदोलनों में भागीदारी

ग्राम निडाना (रोहतक) में आपके प्रचार के समय विपक्षियों ने सांग शुरू कर दिया। आपने वहीं शेरदिल वक्तव्य दिया, जिसके बाद घटना ने गंभीर रूप लिया, लेकिन भक्त फूलसिंह जी ने मामले को सुलझाया। 1957 के हिन्दी रक्षा आन्दोलन में जेल गए। गोरक्षा आन्दोलन में आप 14 प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक थे, जिन्होंने चण्डीगढ़ सचिवालय के सामने धरना दिया। कई बार पुलिस ने आपको गिरफ्तार कर अलग-अलग स्थानों (अम्बाला, जगाधरी, नालागढ़, हरिद्वार) में छोड़ा, लेकिन आप पुनः धरने पर जा डटते रहे। अंततः आपको फिरोजपुर जेल भेजा गया।

जीवनशैली और आदर्श

आपका जीवन सादगी, संयम और तपस्या से भरा रहा। धन का लोभ आपमें कभी नहीं रहा। प्रचार में जो भी धन प्राप्त होता, उसे गुरुकुल भैसवाल, गुरुकुल झज्जर आदि संस्थाओं को दान कर देते। आपने तन, मन और धन से आर्यसमाज की सेवा की।