अ॒ग्निमिन्या॑न्तो॒ मन॑सा धियं सचेत॒ मर्त्यः। अ॒ग्निमा॑धे वि॒विस्व॑भिः॥
ऋ. ८.१०२.२२
तर्जः प्रीती की भूमि तेल्लीदे पिरिदूल्लू जाग मिल्लदे
कर्म तो मानव करे, कर्म में अग्नि जले,
अग्नि जलाते हुए, यज्ञ के भाव रहें।
जीवन शक्ति, यज्ञ में अर्पित हो
धन जन मन कहीं भी वैभव हो
यज्ञ अग्नि का ग्रहण यज्ञ के कर्म के स्तर तक होवे ॥
॥ कर्म तो मानव
ब्रह्माण्ड में व्यापक हो रहा यज्ञ
उसकी एक चिंगारी में चमके कृत्य
यज्ञ की इन, चिंगारियों को
किये पुनः यज्ञार्पण बने उरु
यज्ञ-संकल्प करे, जीवन करे गरु
हव्य देवों का है, द्विबन्धु॥
॥ कर्म तो मानव
आग जलाई किन्तु यज्ञ-बुद्धि
पैदा ना कि तो अग्निदोष यहीं
अग्नि का लक्षण जान लेगा जो
यज्ञ के गुण धारण करेगा कई
फलेगा यज्ञ कल्पतरु ॥
॥ कर्म तो मानव
आग जलानी है, हे अग्निदेव !
होके उपास्य हमारे, खूब जलो
आग को आग समझें, ना समझें राख
अनुभव प्रदीप्त हृदय का, पैदा करो
जीवन की, मेरी ज्योतियाँ श्रेय
भेंट करूँ तुझे हे अग्निदेव !
॥ कर्म तो मानव
(कृत्य) कर्म। (उरु) अधिक मूल्यवान। (गरु) प्रतिष्ठित, यशस्वी। (हव्य) आहुति, अन्न।
(द्विबन्धु) अग्नि, दो लोकों वाला बन्धु। (यज्ञ-हितु) यज्ञ द्वारा हित करने वाला।
(कल्पतरु) मुँह माँगी वस्तु देने वाला। (उपास्य) पूजा के योग्य। (श्रेय) कल्याण कारक।










