त्वामिद्धि त्वा॒यवे॑ ऽनुनोनु॑वत्श्चरान्। सर्वाय इन्द्र कारव॑ः।।
-ऋ. ८.६२.३३
तर्ज : प्रार्थना सुनिये श्री भगवान
प्रार्थना सुनिये श्री भगवान
कीजिये जीवन का उत्थान ॥
॥ प्रार्थना ॥
हृदय-भक्ति से चारु होकर
करें परिचरण पारु होकर
हृदय प्रीत झंकार दीजिए
वाणी को वरदान ॥
॥ प्रार्थना ॥
स्तुतिगान-मस्ती में झूमें
बरसें ज्ञानामृत की बूँदें
जगह जगह तव अलख जगायें (2)
लक्ष्य हो कर्म प्रधान ॥
॥ प्रार्थना ॥
स्तुति रूप में धर्म कर्म हो
गुणगाथा संग सत्य-वरण हो
होवे सेवा अतिलयकारी
कर्म वचन मन प्राण॥
॥ प्रार्थना ॥
जागें स्वयं तो जग को जगायें
व्यापक भजन क्रियामय गायें
तेरी शक्ति, मति-भक्ति का
बहे प्रवाह निकाम ॥
॥ प्रार्थना ॥
(परिचरण) पूजा, सेवा। (चारु) सुन्दय, प्रिय, रुचिकर। (पारु) सूर्य, अग्नि। (लयकारी)
लय में चलने वाला, लगन पूर्वक। (अलख) ईश्वर से भीख माँगना। (निकाम) यथेष्ट,
बहुत, अत्यधिक ।










