त्वया॑ व॒यम॑त्त॒मं धीमहे वो बृह॑स्पते प्रप्रिंणा सत्रिना युजा ।
मा नौ दुःशंसौ अभिदि॒प्सुरींशत् प्र सुशंसता॑ म॒तिर्भिस्तारिषीमहि।।
ऋ. २.२३.१०
तर्ज : पोयवरूवान कूड़ेवरू पोरमगडे इदिले
हे परमेश! ब्रहस्पति ! वेदवाणी के हो अधिपति
ज्ञान के तुम ही हो अधीश्वर शुद्ध स्वरूप हो ‘पप्रि’॥
॥ हे परमेश॥
तुम ही सबके हृदयों में बैठे, कर्तव्याकर्तव्य की
ज्ञानधारा को बहा रहे हो धारा है ये सत्कर्मों की।
॥ हे परमेश॥
सबके जीवन के पूर्णता कारक शुद्ध स्वरूप हमारे ‘पप्रि’
शुद्ध करन हारे हम सबके, तुम हो हमारे सस्त्रि ॥
॥ हे परमेश॥
जिसके सखा तुम बन जाते हो उसके व्यवहार निखरते।
शुद्धता पूर्णता से अनुकरणीय जीवन जाग्रत तुम करते ॥
॥हे परमेश॥
प्रभु जी हमारे सखा बन जाओ जीवन पूर्ण पवित कर दो।
आत्म-बुद्धि-मन प्राण चक्षु श्रोत्र के, छिद्रों को भर दो।
॥हे परमेश॥
इस संसार में दुःशंस दिप्सु घात लगाये बैठे हैं
चाहते हैं अपकीर्ति हमारी बुरी सलाहें देते हैं।
॥ हे परमेश॥
हे ब्रहस्पति प्रभु! बल आशीश दो करते रहें शुभ चिन्तन
होके सुशंस गायें शुभमङ्गल करें शुभ-स्वागत हरदम॥
॥ हे परमेश॥
(पप्रि) पालन पूरण करने वाले। (सस्त्रि) स्वयं शुद्ध पवित्र और समपर्क में आने वाले
को पवित्र करना। (दुःशंस) शिकंजे में कसने वाले घाती। (दिप्सु) हिंसक। (पाश्विक)
पाशों में बाँधने वाले। (सुशंस) शुभ एवं शुद्ध व्यवहार करने वाले।










