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प्राणा शिशुमहीना हिन्वत्रतस्य दीधितिम्। विश्व परि प्रिया भुवदध द्विता ।।
साम. 590. १०१३
तर्जः पूजा विम्बम सीतिरनोवो तानी नड़कुड़-720 (राग-अहीर तोड़ी)
पूजा था तुम्हें पिता मानकर मातृ स्नेह का लाड़
करते हैं तुम्हें प्यार प्रभुजी मान के शिशु तुम्हें आज
कुछ अलौकिक सी है भावना, तुम बछड़े हो गाय हैं हम
बछड़ा गैया का प्राण ही तो है, चूमना चाटना गैया का जीवन
॥ पूजा॥
दूध पिलाती तन्मयता से चूम चाट सुथरा करती
इक भी तिनका यदि हो तन पे जुबाँ से अपनी हटाया करती
है पराकाष्ठा उसके प्यार की है निस्वार्थ गऊ का अनुराग (2)
॥ पूजा॥
ये निस्वार्थ सेवा ही यज्ञ है, इसको ही कहते हैं आत्महुति
इसका रहस्य तो माँ ही जाने, आहुति है ये मात-वसु की
मानव मात्र की मात है ऐसी आत्म समर्पण है उसका अवाच (2)
॥ पूजा ॥
सोते जागते चलते फिरते मात-जीवन का केन्द्र है बालक
गर्भ से लेकर जन्म तलक सुख न्योछावर करती वो पालक
ध्यान में रखती उसका खाना पीना सोना हो या विलाप ॥ (2)
॥ पूजा ॥
चाँद तो सबके मन को भाता, पर माता की दृष्टि अलग
बालक चाँद को देख उछलता देखो तब माता की हरख
खेल खिलौने तस्वीरों पर बैठ जाता माँ का अनुराग। (2)
॥ पूजा ॥
यज्ञ की यही मनोवृत्ति हमारी हृदय में आके बसी है
शिशु रूप में प्रकट हुए तुम अब किस बात की कमी है
जो कुछ समझा था है हमारा तुमको समर्पण किया अवस्तात् (2)
॥ पूजा॥
इस शरीर के हर इक अङ्ग का हार्दिक भाव है ‘इदन्न मम’
जीते हुए तेरी पूजा कर सकें इसलिये खाते पीते हम
भाग ले सकें यज्ञ में तेरे अतः स्वास्थ्य रक्षा, उत्साह (2)
॥ पूजा॥
अब तुम शिशु हो हम हैं माता हम गैया तुम बछड़े
प्यारा लगने लगा जगत ये क्योंकि हो गये हो तुम अपने
आने लगा है दोहरा आनन्द भी, बछड़े ने गौ को किया आत्मसात। (2)
॥ पूजा॥
अणु अणु अङ्ग अङ्ग हुआ तुम्हारा, इसलिये हुआ जीवन बहुमूल्य
फिर क्यूँ हम इसे व्यर्थ गँवायें, शक्ति तुम्हारी मिली अतुल्य
लाज रखो प्रभु इस जीवन की, देते रहो निज प्रेम-प्रसाद (2)
॥ पूजा॥
(अलौकिक) अद्भुत (सुथरा) निर्मल, स्वच्छ (पराकाष्ठा) चरम सीमा, हद (अनुराग) प्रेम
(आत्महुति) आत्मा का यज्ञ (क्सु) बसने वाला (अवाच) मौन (विलाप) रोना, रुदन
(अवस्तात्) आखिर, अंततः (इदंन्न ममु) ये मेरा नहीं (आत्मसात) अपने जैसा करना










