आत्मन् यज्ञ का संचालन

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इ॒मं नौ अग्न॒ उप॑ यज्ञमेहि पञ्चयामं त्रिवृत॑ स॒प्तत॑न्तुम् ।

असो हव्य॒वाळुत नंः पुरोगा ज्योग्व दीर्घ तम् आशयिष्ठाः ॥ ऋ. १०.१२४.१

तर्ज : पुलर वेईलुम पगल मुगितुम

हे आत्मन् नींद से जाग, कर जीवन यज्ञ का संचालन
मोहान्धकार में क्यों पड़ा यज्ञ का कर ले विचारण
या विमुख ना तू हो तम की गुहा में ना कर आसन॥ ॥हे आत्मन्॥

बन पुरोगा, कर नेतृत्व कर अध्यक्षता नित यज्ञ की
जीवन यज्ञ की त्रिवृत् अवस्था, बाल्य यौवन वार्द्धक्य की
त्रिसवन है यज्ञ (2) आ 5555
आयु के त्रिचरण में होवे यज्ञ का प्रणयन॥
॥हे आत्मन्॥

पंचायाम है ये याजन पञ्चयमों में है नियन्त्रित,
अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह के आश्रित
पालन इसका कर (2) आऽऽऽऽ
पंचयामी याजक तो करता जीवन पावन॥
॥हे आत्मन्॥

सप्त ऋत्विज करते सतत् अविघ्नित याजन नित
पञ्च कर्मेन्द्रियाँ प्राण अपान जीवन यज्ञ के हैं ऋत्विज
सप्त तन्तु प्रवर (2) आ ऽऽऽ
ज्ञान कर्म के हव्य, बने यज्ञ साधन
॥हे आत्मन्॥

हव्यवाट् बन हे आत्मन् ! कर ले वहन आहुति को
बिना तुम्हारे पहुँच गया यज्ञ अवरोधित स्थिति को
ज्ञान कर्म को (2) आ 5555
विषय बनाकर कर याज्ञिक भाषन

(आसन) निवास। (पुरोगा) आगे ले जाने वाला अध्यक्ष। (त्रिवृत्) तिगुना। (त्रिसवन)
तीन स्थानों या स्थितियों का यज्ञ। (वार्द्धक्य) वृद्धावस्था, बुढ़ापा। (त्रिचरण) तीन स्थिति
या विभाग। (यज्ञ प्रणयन) यज्ञ करना। (पञ्चायाम) पाँचयमों से चलने वाला (सत्य
अहिंसा अस्तेय ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह)। (सप्तऋत्विज सप्ततन्तु) (5 कर्मेन्द्रियां प्राण व अपान) याज्ञिक कर्मकाण्ड करने
वाला। (राथन) साधन। (हव्यवाटू) हव्यों का वहन करने वाला। (भाषन) प्रकाशन, दीपन।