अन्न से अत्ता (अन्न से मन का रूप)

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आ प॑वस्व सहस्रिणं र॒यिं सौम सुवीर्यम्। अ॒स्मे श्रववा॑सि धारय।। साम. ५०१

तर्जः पुन्यु पिन्नान तेनी तेगनी लावाण

जीवन चमत्कार! आश्चर्य अपार!
कौन है जानकार? किसका सहकार?
शक्ति कहाँ से आई देह को? कौन इसका आधार?
देखना, सुनना, सूँघना, चखना, छूने का आभास —
होता है आचार, व्यवहार, विचार —
कैसे वो अपने-आप होय?
जीवन ….

ईंट है पत्थर है सूखा काठ है
चेतनता उसमें कहाँ?
वाह रे देह! चेतनता तुझमें देखी यहाँ!
अन्न तू खाता — फिर तू पचाता है
होता विकार रहित।
स्वस्थ शरीर में अन्न ग्रहण की शक्ति है उतनी अधिक
जो भी पदार्थ पहले से था तू चित्ति से शून्य था
चित्ति के पाते ही हो गया चेतन बन गया अब तू अत्ता

अत्ता जीवन का आधार ॥ जीवन…

सात्विक अन्न तो धारण कराता, सुन्दर बलिष्ठ ही रूप

जीती जागती शक्ति तो मिलती धान हों चाहे दूध

ना किसी आम ना घी ना बादाम को कहते हैं पहलवान

किन्तु एक सजीव शरीर ही करता है शक्ति का काम

पाशविक बल से मानविक बल है आध्यात्मिक चमत्कार

मानव का चित्ति ही खुद के शरीर का बनता है मददगार

बनता है मददगार ॥ जीवन…

सात्विक अन्न से सात्विक मन है राजस से राजस मन

तामसिक अन्न से तामसिक मन है ऐसा तो मन है दुर्मन

योगी-अन्न तो भौतिक नहीं है किन्तु आध्यात्मिक आहार

उसकी हर चेष्टा में ईश्वर की झाँकी है रागों की दिव्य बहार

दोनों लयें उसकी अन्न व मन की जो दिव्य शक्ति है सोम

दिव्य संजीवनी योग की शक्ति जिसमें है ओजस्वी ओ३म्

ओ३म् ही प्रेमाधार॥ जीवन…

ऐ मेरे आध्यात्मिक स्त्रोत —
जीवन! बहता जा, बहता जा आज
नई नई शक्ति अङ्गों में लेके गाता जा स्वर सोम राग

अन्न को मेरे तू अत्ता बनाकर मन का ही रूप रंगा

मेरे भौतिक भोगों को तू वितत विभूतियों से चमका

भोक्ता में भोक्तृत्व गर हो नदारद ऐसा तो भोग बेकार

अन्न व मन के दिव्य संदेशों से ईश का कर साक्षातकार

ईश का साक्षातकार

जीवन….