ऐना वो अ॒ग्नि नम॑तो॒र्जो नपा॑त॒मा हुवे।
प्रियं चेति॑िष्ठर॒तिं स्व॑ध्व॒रं विश्व॑स्य दूतम॒मृत॑म् ॥ ऋ. ७.१६.१
तर्जः पुन्नुशस्यम नुम नीराकुवान वरुमी राग मधुवंती
हो रही है प्रतीति मुझे आज विशेष बल की
रसमय अद्भुत शक्ति ।। (2)
कल तक तो मैं अशक्त था,
मिली अपूर्व अब शक्ति — मीठी-मीठी।
॥ हो रही ॥
शक्ति ऐसी पाकर आनन्द आ रहा मुझको ।। (2)
बल से यदि चाहूँ तो संसार हिला दूँ अब तो।
ऐसा किया सचेत मुझे,
इक बलधारा जो उमड़ी।
॥ हो रही ॥
यह मीठी-मीठी प्रेरणा,
क्या सचमुच देव तुम्हारी?
निर्बल था — अब हुआ सबल,
साधना सफल हुई सारी।
द्वार तेरा खटखटाया,
सुन के भीख दे दी बल की (2)
॥ हो रही ॥
यह महायज्ञ की शक्ति, आदर्श व्रती ईश्वरी। (2)
मिली जो शक्ति उससे — वो शक्ति है अध्वर की।
विश्व-संदेश की अग्नि, मानो अङ्ग-अङ्ग मेरे छलकी। (2)
॥ हो रही ॥
दूत बनी है अग्नि इस विश्व के दिव्य संदेश की (2)
मरणशील मानव की रोम-रोम से बोल उठी —
मेरे लिए अब मृत्यु कहाँ?
थी बाट इसी अमर पल की। (2)
॥ हो रही ॥
अमर वस्तु है अध्वर जिसके कारण बना जहान भी (2)
अमृत यज्ञ नहीं मरता है, मरता नहीं यजमान भी।
कितनी विशाल ये आग है, जो हर पल रहती जलती। (2)
प्रेरणा शक्ति इसमें — उज्ज्वलता कितनी अतिरेक! (2)
॥ हो रही ॥
कितना प्रभावशाली इसका विश्व-याग संदेश!
तुझे नमन, तेरे बल को नमन —
ये ज्योति रहे मुझे फलती। (2)
अपनी शक्ति दी है मगर डर मुझको अब हे शक्तिधर! (2)
॥ हो रही ॥
लँगड़े की लाठी जो बने हो, बने रहो हे प्रीतिकर।
आँख से ओझल ना रहो, चाहे घड़ियाँ रहें बदलतीं।
॥ हो रही ॥
यज्ञ को चलित ही रखना चाहे जियूँ चाहे मर जाऊँ (2)
हे चेतिष्ठ सहायक, चेतनता तुझसे पाऊँ।
तुम शक्तिरस की शान हो, तुझ पर मैं अवलम्बी।
॥ हो रही ॥
(प्रतीति) निश्चय (अध्वर) यज्ञ (अतिरेक) अधिकता (चेतिष्ठ) चेतना देने वाले। (संतति) सन्तान (अवलम्बी) आश्रित।










