देवस्य सवितुः सवे कर्म कृण्वन्तु मानुषाः ।
शं नो भवन्त्वप औषधीः शिवाः ॥
अथ. ६/२३/३
तर्जः पुन्नाम्बल पुडयिरम दिनम् गळ अनाध्यम
ऐ मानव ! कर कर्तव्य पालन
विदुर सविता को कर ले धारण
वो प्रेरणा दायक है सविता
देता कर्तव्य कर्म का मन
प्रेरणा उसकी यदि तू सुनना चाहता है हरदम
तो अन्तर्मुख कर ले ऐ मानव! अपना चञ्चल मन
प्रभु के प्रति समर्पित हो जा अनुग आत्मन् ! ॥ ऐ मानव ॥
बिना सोचे ना अन्धाधुन्ध करम कर चञ्चल मन
जिसका परिणाम बुरा है वो ना कर देना तू अकारण
कर तो लेगा मगर किस खाई में जा के गिरेगा
चाहे ना चाहे तो भी फल उसका भुगतना पड़ेगा
हो सकता है किसी विद्वान से तू बोध तो ले ले।
आखिर तो वो भी है अल्पज्ञ ज्ञान उसका भी है कम॥ ॥ ऐ मानव ॥
इसलिये सविता प्रभु की प्रेरणा ले के चल
शान्ति सुख प्रीति बढ़ेगी फिर तू जाएगा संभल
भावना कलह विद्वेष की मन से जाएगी निकल
सच्चे चारित्र्य का निर्माण होगा दिन प्रतिदिन
तो फिर मानव साम्राज्य, प्रभु साम्राज्य होगा भिन्न
तो जीवन वसंत ही वसंत हो जाएगा अद्यतन ॥ ॥ ऐ मानव॥
इस तरह जल औषधियाँ होगी, सुखकारी शिव
नदियाँ देंगी शीतलता करेगी भूमि सहनशील
चन्दा सूरज व सितारे ज्योति देंगे नित दिव्य
व्यक्तिगत सामाजिक होंगे जीवन सबके समृद्ध
यही तो वेद की हैं प्रेरणायें और आदर्श
लेके कर्तव्य की शिक्षायें पाले शान्त जीवन,
(विदुर) ज्ञानी, पण्डित (अनुग) पीछे चलने वाला। (अल्पज्ञ) थोड़े ज्ञान वाला। (अयतन आज का !










