पं० विश्वम्भरदास जी

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जन्म एवं परिवार

पं० विश्वम्भरदास जी का जन्म हरियाणा के झज्जर (रोहतक) के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ।यह परिवार आज भी “दीवान” नाम से प्रसिद्ध है।आपके पिता का नाम पं० पारसलाल जी था।झज्जर निवासी पं० विश्वम्भरदास जी को आज भी “दीवान जी” के नाम से याद किया जाता है।

शिक्षा एवं संस्कार

आपने मैट्रिक तक की शिक्षा प्राप्त की और आगे कुछ समय गुरुकुल काँगड़ी में भी अध्ययन किया। भारतीय संस्कृति और वेशभूषा के प्रति आपकी गहरी श्रद्धा थी। सेना में भर्ती होकर जब आप अफ्रीका पहुँचे तो वहाँ आपको महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत “सत्यार्थप्रकाश” पढ़ने का अवसर मिला। इस ग्रंथ का स्वाध्याय आपके जीवन का मोड़ साबित हुआ।

गुरुकुल झज्जर की स्थापना का संकल्प

सत्यार्थप्रकाश से प्रभावित होकर आपने प्राचीन “आर्ष पद्धति” की शिक्षा-प्रणाली को पुनर्जीवित करने का निश्चय किया। आपने सेवा से त्यागपत्र देकर भारत लौटकर स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज से भेंट की। आपके सतत प्रयासों से झज्जर में गुरुकुल स्थापना हेतु १३८ बीघा भूमि प्राप्त हुई। १६ मई १९१५ को स्वामी श्रद्धानन्द जी महाराज के करकमलों से गुरुकुल महाविद्यालय की आधारशिला रखी गई।

जीवनचर्या एवं व्यक्तित्व

आप नंगे पैर और नंगे सिर रहते थे। केवल लंगोट और ऊपर से चोगा पहनते थे। निकटवर्ती गाँवों में आपने आर्य समाज का व्यापक प्रचार किया। सरल जीवन, त्याग और तपस्या आपके चरित्र की विशेषता थी।

सेठ जगन्नाथ प्रकरण

गुरुकुल संचालन के लिए आपने कलकत्ता के सेठ जगन्नाथ से आर्थिक सहायता जुटाई। सेठ ने धन व्यापार में लगाकर लाभ तो दिया, परंतु बाद में मूलधन लौटाने से मुकर गया। इससे पं० विश्वम्भरदास जी को गहरा आघात लगा और 1920 में मानसिक अस्वस्थता आ गई। बाद में सेठ जगन्नाथ को कुष्ठ रोग हो गया और उसने प्रायश्चित्तस्वरूप वह धन स्वामी श्रद्धानन्द जी को लौटा दिया। अन्ततः वह धन गुरुकुल झज्जर के खाते में जमा हो गया।

हरिद्वार प्रवास एवं अन्तिम जीवन

हरिद्वार में “रानी इकड़ी की हवेली” नामक स्थान पर आप निवास करते थे। हरिद्वार से झज्जर तक प्रायः पैदल यात्रा किया करते थे। अन्तिम दिनों में आपने नमक और घी का त्याग कर दिया था। सन् 1933 में गाजियाबाद के मार्ग में आपकी देहावसान हुआ।

गुरुकुल झज्जर का भविष्य

आपके बाद स्वामी परमानन्द जी और स्वामी ब्रह्मानन्द जी ने गुरुकुल का कार्यभार संभाला। 1942 में आचार्य भगवान्देव जी ने “आर्ष पाठविधि” को गुरुकुल में पुनः प्रारम्भ किया।

आज गुरुकुल झज्जर में—

संस्कृत महाविद्यालय,विद्यालय,पुरातत्त्व संग्रहालय,आयुर्वेदिक रसायनशाला,गोशाला,विश्वम्भर वैदिक पुस्तकालय,हरियाणा साहित्य संस्थान तथा सुधारक मासिक पत्र (1953 से प्रकाशित)
सुचारु रूप से कार्य कर रहे हैं।

उपसंहार

पं० विश्वम्भरदास जी का जीवन त्याग, तपस्या, सत्यार्थप्रकाश से प्रेरणा और राष्ट्रभक्ति का आदर्श उदाहरण है। आपके संकल्प से रोपित गुरुकुल झज्जर आज एक वटवृक्ष बनकर भारतीय संस्कृति और वेदज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रहा है।