जन्म व प्रारम्भिक जीवन
आपका जन्म हिसार जिले की हांसो तहसील के अन्तर्गत उमरा नामक ग्राम के पास (जहां पहिले एक गुरुकुल भी चलता था) देपल की ढाणी नामक ग्राम में हुआ था। आपके पिता जो एक सामान्य किसान थे। बाल्यकाल में ही आपका विवाह कर दिया था। आप वाल्यकाल में ग्राम के स्कूल में ही पढ़ते रहे। सौभाग्यवश एक सज्जन अध्यापक ने आपको एक धार्मिक शिक्षा नामक पुस्तक पढ़ने को दी जिस में ब्रह्मचर्य की महिमा का वर्णन था। उसी दिन से आपने ब्रह्मचर्य के महत्त्व को समझा और ब्रह्मचर्यपालन की सच्ची लग्न लग गई।
ब्रह्मचर्य-संकल्प और गृहत्याग
माता-पिता ने आपको गृहस्थी बनने के लिये बाधित किया, किन्तु आपको तो ब्रह्मचर्य पालन की सच्ची धुन लग चुकी थी। आप ऋषि दयानन्द की भांति घर छोड़कर चले गये। घूमते-घूमते दयानन्द वेद विद्यालय देहली में पहुंचे, जो आचार्य राजेन्द्रनाथ जी शास्त्री की देख-रेख में चल रहा था। उन दिनों आचार्य भगवान्देव जी भी इसी विद्यालय में विद्याध्ययन कर रहे थे। आचार्य जी ने इन्हें सम्भाला और इनके विचारों को पूरा बल दिया। स्वामी जी के जीवन-निर्माण में आचार्य जी का पूरा-पूरा हाथ रहा।
माता-पिता से संघर्ष
माता-पिता ने इनका खोज निकाल लिया और विद्यालय में आ पहुंचे। इन्हें घर चलने के लिये बाधित करने लगे। ये तो घर से सर्वथा विरक्त हो चुके थे और ब्रह्मचर्य के वास्तविक आनन्द को पहचान गये थे। इन्हें गृहस्थ से घृणा हो चुकी थी। माता-पिता के सर्वविध प्रयत्न असफल रहे यहां तक कि एक बार इन्हें पिता जी ने लाठी लेकर मारा भी किन्तु ये अपने दृढ़ निश्चय से विचलित नही हुए।
“न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदन्न धोराः” – इस भर्तृहरि के बचन का दृढ़तापूर्वक पालन कर आपने धैर्य का उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत किया।
पत्नी को लेकर परीक्षा
एक बार माता-पिता आप की धर्मपत्नी को लेकर भी विद्यालय में पहुंचे। यहां तक भय दिखलाया कि यदि तुम घर नहीं चलते तो हम इसे भी यहीं छोड़कर जायेंगे। किन्तु आपने इसकी भी कोई परवाह न की, अपने निश्चय पर अडिग रहे। श्री आचार्य भगवान्देव जी ने भी इस समस्या को सुलझाने में इन्हें पूरा सहयोग दिया।
आर्य विद्यार्थी आश्रम, नरेला
श्री आचार्य भगवान्देव जी ने नरेला में “आर्य विद्यार्थी आश्रम” की स्थापना की जहां अनेक ब्रह्मचारी आर्य सिद्धान्तों का अध्ययन करते और जीवन साधना में रत रहते थे। स्वामी जी ने भी अनेक वर्ष यहाँ निवास किया तथा अपने जीवन को आदर्श जीवन बनाया। आप सभी नित्य कर्म अत्यन्त श्रद्धा भक्ति से किया करते थे। आप अत्यन्त व्यायामश्रमि थे। आपका कद लगभग छः फुट था। आप एक दर्शनीय नवयुवक थे। आप घंटों संध्या किया करते थे। आप सच्चे योगानन्द ही थे।
गुरुकुल झज्जर का जीवन
सन् १९४२ में श्री आचार्य भगवान्देव ने गुरुकुल झज्जर (रोहतक) का कार्यभार सम्भाला। स्वामी जी आचार्य जी के ही पदचिह्नों पर चलते थे। स्वामी जी भी अध्ययनार्थ गुरुकुल झज्जर में पहुंचे। यहाँ संस्कृत-व्याकरण का अध्ययन किया। आप एक घण्टे में अष्टाध्यायी के ४ हजार सूत्रों का पाठ कर दिया करते थे। साथ-साथ आप गुरुकुल में सेवा कार्य भी करते रहे। गुरुकुल के लिए अन्न-संग्रह तथा प्रचार कार्य भी आपने बड़ी लग्न के साथ किया।
प्रचार कार्य और प्रेरणादायी व्यक्तित्व
एक दिन आप श्री आचार्य भगवान्देव के साथ ग्राम बालन्द (रोहतक) में मैजिक लालटेन द्वारा प्रचारार्थ गये। ग्राम में दो दिन प्रचार हुआ। … (लेखक का अनुभव: आपके ओजस्वी भाषण ने मुझे आर्य समाज की शरण में आने के लिए प्रेरित किया।)
धन्य हैं स्वामी जी महाराज जिन्होंने अपने आदर्श जीवन और ओजस्वी वाणी से युवाओं को प्रभावित किया।
कठिन परिस्थितियाँ और धैर्य
सन् १९४७ में जब हिन्दू-मुस्लिम झगड़ा हुआ और पाकिस्तान बना, तब आप कुल्लू कांगड़े के पहाड़ों में गये हुए थे। वहाँ आप पर सिखों ने हमला किया किन्तु अपने अद्भुत बल और ब्रह्मचर्य की शक्ति से आपने अपना बचाव किया।
माता का स्वर्गवास और वैराग्य
माता के देहावसान का समाचार सुनकर आपने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया – “हो गया होगा।”
यह आपके अलौकिक वैराग्य का उदाहरण था।
आयुर्वेद अध्ययन
समाज सेवा के लिए आपने आयुर्वेद को उपादेय समझा। आचार्य भगवान्देव जी की अनुमति से आप “आयुर्वेदिक तिब्बिया कॉलेज, दिल्ली” में अध्ययन हेतु गए।
आकस्मिक निधन
इसी बीच आचार्य भगवान्देव जी को मोटर साइकिल दुर्घटना में चोट लगी। आप उनसे मिलने नरेला जाते समय रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे। भीड़ होने के कारण आप खिड़की से बाहर खड़े रहे। किसी यात्री के धूम्रपान से बचने हेतु आपने सिर पीछे किया और सिग्नल से टकरा गये। सिर फटने से आप रेल से गिर पड़े और रक्तस्राव से तत्काल ही स्वर्गवासी हो गये।
आपकी मृत्यु का समाचार सुनकर आचार्य भगवान्देव जी को अत्यन्त गहरा आघात लगा।
अन्त्येष्टि और शोकसभा
आपका वैदिक रीति से दिल्ली में अन्त्येष्टि संस्कार हुआ। गुरुकुल झज्जर व आर्य समाज में गहरा शोक छा गया। तिब्बिया कॉलेज में भी शोक और हड़ताल रही। स्वामी आत्मानन्द जी तथा अन्य विद्वानों ने भी गहरा दुःख व्यक्त किया।
स्वामी योगानन्द जी का स्मारक
आपकी पुण्य स्मृति में –
वैदिक साहित्य सदन (दिल्ली) की स्थापना हुई। यहाँ से ब्रह्मचर्य सम्बन्धी एवं वैदिक साहित्य का प्रकाशन हुआ।
हरियाणा साहित्य संस्थान (गुरुकुल झज्जर) की स्थापना भी आपकी स्मृति में हुई।
इन संस्थानों ने देश-विदेश में असंख्य युवकों को वैदिक साहित्य और ब्रह्मचर्य-जीवन की प्रेरणा दी।
स्वभाव और विशेषताएँ
स्वामी जी अत्यन्त सुशील, शान्त स्वभाव के साधु थे। उनके मुखमण्डल पर कभी क्रोध का आभास नहीं देखा गया। बार-बार पूछने पर भी उन्होंने माता-पिता या ग्राम का नाम बताना उचित नहीं समझा। सभी सहचर उनकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करते थे।
उपसंहार
स्वामी जी आज शरीर रूप से हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनके आदर्श, ब्रह्मचर्य और वैराग्य की प्रेरणा सदा अमर रहेगी।
भगवान संसार में ऐसे विरक्त साधु समय-समय पर उत्पन्न करते रहें।










