साधुरेव न जहाति साधुतां दुर्जनेन सह सम्मिलन्नपि । जन्मतः प्रभृति काकसङ्गतः काकसङ्गतः पश्य रौति मधुरं हि कोकिलः ।।
स्वार्थ समीर चली ऐसी, सब सुमन सुमन बिखराये । हा सद्भाव सुगन्धि चुराई. प्रेम प्रदीप बुझाये ।।
जन्म एवं पारिवारिक परिचय
श्रीयुत वृजलाल जी चिचोली के निवासी थे। चिचोली मध्यप्रान्त के बैतूल जिला में है। वहाँ एक घायंसमाज है जो कई वर्षों से बंदिक धर्म के प्रचार का कार्य वहां के ग्रामों में कर रहा है। इसके साप्ताहिक अधिवेशन भी बड़ी अच्छी तरह सम्पन्न होते हैं। जब इस समाज का विजया दशमी के अवसर पर वार्षिकोत्सव होता है तब भी यहां के गोंड कौरकू तथा किसान आदि प्रायः सहस्र दो सहस्र की संख्या में उपस्थित हो जाते हैं।
देहातों में प्रचार का कार्य यहां के आर्य भाइयों ने अपने ही सिर पर उठाया हुआ है। गोंडी भाषा में इन्होंने ट्रैक्टों का अनुवाद किया हुआा है तथा कुछ गाने भी बनाये हुये हैं। वार्षिकोत्सव के समय बाहर से एक उपदेशक बुला लेते हैं। भजन मंडली आदि का कार्य स्वयं सम्भाल लेते हैं। गोंडी भाषा में तथा हिन्दी में यहां के कार्यकर्ता भापण दे लेते हैं तथा सत्यार्थप्रकाश आदि के सहारे से वे शंका-समाधान भी करते हैं। श्रीयुत वजलाल जी इसी समाज के उसाही कार्यकर्ता थे। आपके पिता जी का नामा पटेल तथा माता जी का नाम तापी बाई था। आपकी धर्मपत्नी श्री भागीरथी बाई थी।
ताजियादारी की कुप्रथा का अंत
आर्यसमाज के प्रचार के पूर्व चिचोली में प्राय. तीस चालीस ताजिये हिन्द्रयों की तरफ से थे। समाज ने अपने निरन्तर प्रचार और परिश्रम के द्वारा इस प्रथा को बन्द कर दिया। इससे ग असहिष्णु पिञ्जरे मुसलमान बहुत बिगड़ गये। इसके बाद समाज ने एक बुद्धि की। श्रीमती पुलि क्षत्रिय को जो मुसलमान हो गई थी समाज ने शुद्ध करके उसका पुनविवाह उसी के सजाती कर दिया ।
हिन्दू समाज का संगठन
श्री बृजलाल जी का ताजियादारी की कुप्रया का अन्त करने में बहुत बड़ा हाथ था। यापने के ग्राने अविरत प्रयत्न और मिलनसारी के द्वारा उपरोक्त शुद्धि की हिन्दू भाइयों से स्वीकृति कराई थी। इसके बाद आर्यसमाज ने हिन्दुओं को सङ्गठित करने के लिये उनके डोल गणपति के उत्सव में ज दिया। परिणाम यह हुआ कि जहां अन्य वर्ष इस उत्सव की उपस्थिति अंगुलियों पर गिनने रहती थी वहां उस वर्ष सात आठ सौ हिन्दू सम्मिलित हुये।
धर्मान्धों का विरोध
आर्यसमाज का दिनों दिन बढ़ता हुण प्रभाव धर्मान्ध मुसलमानों को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने ग्रायों के निजी तथा सामाजिक कार विघ्न डालना शुरू किया। साप्ताहिक सत्संग में पिञ्जारे मुसलमानों के बालकों ने पत्थर फेके। उन्हें पकड़ कर पुलिस में रिपोर्ट कर दी गई। आयों को उन्होंने जहाँ तहां गावों में तया वार्षिक उत्सव गन्दी गन्दी गालियां सुनाई। ग्रार्यों को कत्ल कर देने की अफवाहें भी गरम होने लगीं।
खेत विवाद
इसी बीच श्री वृजलाल जी के ग्राम के कुछ काश्तकारों के सेत विक्री पर बढ़े। मुसलमानी रे विरोध किया और कहा कि हमारे रहते काफिर वृजलाल खेत कैसे खरीद सकता है? उन्होंने बहुर मूल्य बढ़ाकर काश्तकारों से सौदा पक्का कर लिया और लिखा पड़ी करा ली। श्री बृजलाल वीर इसके विरुद्ध अदालत में कार्यवाही की और दरख्वास्त दी कि खेत का मूल्य निश्चित कर दिया जाने। अदालत ने एक खेत की १५००) तथा दूसरे खेत की ६७५) कीमत निश्चित की। उन्होंने वह रुपया जा करा दिया। इस पर अदालत से १५००) वाले खेत पर कब्जा दिलाने के लिए चपरासी ग्राया। कुक लाल जी ने उसके साथ जाकर उस खेत पर कब्जा ले लिया। ६७५) वाले खेत पर भी कब्जा दिलाने के लिये चपरासी आया। ये उसके साथ खेत पर पहुँचे। उस समय सन्ध्याकाल हो रहा या अतः लौटकर आगये ।
शहादत (12 अक्टूबर 1928)
दूसरे दिन चपरासी के साथ ता० १२-१०-१९२८ को श्री वृजलाल जी खेत पर कब्जा लेने के लिये पहुंचे । खेत मौजा चिचोली से लगभग दो मील दूर होगा। उस समय दिन के तौ बजे थे। वहीं पर कातिल अब्बास खा ने श्री बृजलाल जी के साथ धोखा किया। उसने एक ही धुरा उनके छाती में ऐसा मारा कि उनके प्राण पखेरू वहीं पर तत्काल उड़ गये। उन्होंने सदा के लिये याखें मूद लीं।
मुकदमा और सजा
अब्बास खाँ और उसके तीन साथी पकड़े गये, उन पर बैतुल की श्रदालत में मुकदमा चला। …
अन्ततः अदालत ने १८-१-२९ तथा १९-१-२९ ई० को अब्बास खां की फांसी की सजा बहाल रखी। शेष तीनों को जिन्हें फांसी की सजा हुई थी, बिलकुल बरी कर दिया ।
पुनः कातिल अब्बास खां की तरफ से दया प्रार्थना की एक दरख्वास्त गवर्नर नागपुर को दी गई। परन्तु फांसी की सजा बहाल रही। तब हिज एक्सीलेंसी वाइसराय दिल्ली को कृपा प्रार्थना का आवेदन पत्र भेजा गया। बाइसराय ने फांसी की सजा मंसूस करके उसे केवल १० वर्ष की सजा दी।
परिवार पर प्रभाव
घातकों को जो फल मिला वह तो आपने देख लिया। अब जरा उनके परिवार की ओर दृष्टि फेरें। श्री वृजलाल जी की वृद्धा माता जी और पिताजी अपने इकलौते पुत्र के वियोग को न सह सके । घातकों के साथ हुए व्यवहार ने उनकी छाती को टुकड़ा टुकड़ा कर दिया। वे हाय पुत्र ! हाय बेटा ! कह कर स्वर्ग सिधारे। उनकी धर्मपत्नी ने भी पति वियोग से व्याकुल होकर पति के धाम का मार्ग ग्रहण किया।
संतानें
मृत्यु के समय श्री बृजलाल जी की आयु ३० वर्ष की थी। उस समय उनकी दो कन्यायें तीन वर्ष व पांच वर्ष की तथा एक पुत्र तीन मास का था। बड़ी कन्या कच्छाबाई पश्चात्व को प्राप्त हुई। छोटी पुत्री चन्द्रवती बाई का विवाह आगे चलकर नत्यासिंह जी आर्य से हुआ ।
पुत्र दीपचन्द्र होनहार नवयुवक है। नागपुर कालेज में पढ़ रहा है। आर्यसमाज तथा वैदिक धर्म का दृढ अनुयायी है। अपने पिता की पद पद्धति पर चलनेवाला है।










