वीरवर नारुमल जी

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धर्म वैदिक है हमारा, धार्य प्यारा नाम है।
वेद के अनुसार सारा, जग बनाना काम है।

श्री नाहरमल जो करांची के वासी थे, उनका जन्म उस परिवार में हुआ था जहाँ देशभक्ति की धारा बहती है, जो सार्वजनिक सेवा के तरल तरंगों से तरंगित है, जिस परिवार का प्रत्येक प्राणी देशभक्ति के पुरस्कार से पुरस्कृत है। श्री नारुमल आसूमल का जन्म सन् 1911 में हुआ था। आपके पूज्य पिता श्री आसूमल जी थे। श्री नारुमल जी पाँच भाई थे। उनमें से एक का पहले ही स्वर्गवास हो चुका था। इनके यहाँ मनियारी (विसाती) का व्यापार होता था।

श्री नारुमल जी के पिताजी पूर्व में ही स्वर्गारोहण कर चुके थे। नारुमल जी की शिक्षा-दीक्षा साधारण ही हुई। चौथी या पाँचवीं श्रेणी तक इन्होंने पढ़ाई की। व्यापारिक अक्षर जानते थे। वय की वृद्धि के साथ ही इनमें देशभक्ति और समाज सेवा के भाव जागृत हुए। उनके छोटे भाई भी आर्य समाज के कार्यों में भाग लेते थे। उनके साथ ही इन्होंने भी समाज में जाना प्रारम्भ कर दिया। लाठी चलाना इन्हें आता था। व्यायाम का भी खूब चाव था। देश के लिए कार्य करनेवाली संस्थाओं में इन्हें काँग्रेस से प्रेम था। ये सदा खादी पहनते थे।

इनका सारा परिवार ही सार्वजनिक तथा राष्ट्रीय कार्यों में भाग लेता रहा है। सन् 1919 के खिलाफत आन्दोलन में इनके बड़े भाई डेढ़ साल करांची जेल में रहे। 1931 में इनकी माता को धरने (picketing) में पुलिस ने पकड़ा था, परंतु फिर छोड़ दिया था। वे कांग्रेस के जुलूस आदि में प्रायः भाग लेती थीं। सन् 1931 में सबसे छोटे भाई पम्पनमल ने कपड़े की गाड़ी के सामने, जो स्टेशन जा रही थी, धरना दिया था जिसमें कुछ चोटें खाई थीं। इन्हें भी सन् 1942 के जुलूस में पकड़ा गया था, परंतु फिर छोड़ दिया गया। इनकी माता को भी पकड़ कर छोड़ दिया गया था। सन् 1930-31 के आन्दोलन में नानक बाड़ा मोहल्ले में चुड़सवार पल्टन ने लाठी चार्ज किया था, जिसमें नारुमल को भी चोटें लगी थीं।

श्री नारुमल जी के पुस्तक लिखने पर तथा उनके 1934 के अक्टूबर मास में, उससे पूर्व महाघन बलिदान के पश्चात, बहुत से लोग मुसलमानों को भड़काने लगे थे। मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति द्वेष तथा प्रतिशोध का भाव भरा हुआ था। वायुमंडल साम्प्रदायिक कलह के धुएँ से खूब दूषित था। इस दूषित वातावरण के बीच श्री नारुमल जी मुसलमानों की घृणा के शिकार हो गए।

उनका हत्यारा खोजा जाति का था। कटलरी के सामान की हाथ ठेले द्वारा फेरी लगाना उसका काम था। वह श्री नारुमल जी से बाजे (बजाने वाले) ले गया था। उनमें से दो खराब बताकर वापिस लाया। उनकी दुकान चूड़ी बाजार में थी। उन्होंने कहा कि हम बड़ी दुकान से लाकर बदल देंगे। इतने में उनके पास जो बादामी बंटा था, वह उठकर बाहर गया। एकान्त पाकर उसने नारुमल जी से कहा कि तुम आर्यसमाजी हो, काफ़िर हो, और जोर से वार कर दिया। वार उसके पेट व दोनों हाथों पर किया था। उस समय दिन के 12 बजे थे। शोर सुनकर वह भागा, पर ट्राम के पट्टे पर पकड़ा गया। हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर उसे पकड़ा।

उनके खून की खबर फैलते ही हिन्दुओं ने अपनी-अपनी दुकानें बंद कर दीं। भाई लोग दूसरी दुकान पर न थे, अतः दूसरे लोगों ने श्री नारुमल जी को झटपट अस्पताल पहुँचाया। अस्पताल में उनका स्वर्गवास हो गया। उनकी अर्थी निकाली गई। दस हज़ार आदमी उस अर्थी में सम्मिलित हुए थे। विधिपूर्वक उनका अग्निसंस्कार कर दिया गया। दूसरे दिन करांची भर की दुकानों की हड़ताल रही। इस हड़ताल में सारे हिन्दुओं ने भाग लिया। मुसलमानों ने भी हड़ताल में साथ दिया। कुछ लोगों ने तो दो दिन की हड़ताल की।

उस हत्याकांड पर पुलिस ने मुकदमा चलाया और उस खोजा को फाँसी दे दी गई।